Jab Jab Maregi Machli / जब-जब मरेगी मछली - Paryavaran Ke Dohe @ Kavi Amrit 'Wani' (PD63)



पकड़ो पकड़े मछलियां,  कुआ, नदी तालाब।
जब-जब मरेगी मछली, बहुत रोय तालाब।।

शब्दार्थ :- बहुत रोय तालाब = तालाब को हार्दिक पीड़ा होना 

भावार्थ:- ’’वाणी’ कवीराज कहते है कि बार-बार समझाने पर भी यदि कोई मानता नहीं हैं नदी, कुए, तालाब से मछलियां पकड़ता है उसका वैधानिक हक भी नहीं बनता हैं तो उसके बारे में प्रशासन को सूचना देकर उसे सजा दिलवाए।
सगर कुए इनका भी अपना-अपना परिवार होता हैं । मछलियां भी उस विशाल परिवार की सदस्य हैं । जब-जब भी कोई मछली मछुआरे द्वारा पकड़ी जाने पर कुछ ही समय पश्चात् तड़प-तड़प कर मर जाती है तब तालाब भी बहुत आंसू बहाता है।