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विश्व आदिवासी दिवस


विश्व आदिवासी दिवस 

 आदिवासी जहां रहे , मूल निवासी होय  ।

पीढ़ियों के रिवाज  को,  कभी नहीं वे खोय  ।।

कभी नहीं वे खोय , समय आय देख मिजाज  ।

कैसे शादी-ब्याह , कैसे बजते हैं साज  ।।

कह 'वाणी' कविराज , पांच-पंच जैसा कहे  ।

माने प्यारी बात , जहां आदिवासी रहे  ।।

कथा-सम्राट.........


 धनपतराय श्रीवास्तव हुए कथा-सम्राट  

गोदानगबन,निर्मला  कफ़न,पूस की रात  ।।

कफ़न,पूस  की रात परीक्षा,बूढ़ी काकी ।

अन्तर्द्वंद्व नर-नार रखा ना कुछ भी बाकी ।।

'वाणीप्रेम चंद पहचान ऐसी बनाय  

हिंदी देश-विदेश पहुंचाई धनपतराय  ।।

चंदा मामा जानते, मेरा दूर मुकाम । पहुंचेंगे मुझ तक

चंदा मामा जानते, मेरा दूर मुकाम ।

पहुंचेंगे मुझ तक वही, कोशिश हो अविराम ।।

कोशिश हो अविराम, आया अपोलो ग्यारह ।

तब नीलआर्मस्ट्रांग, एल्ड्रीन चले चंद्र सतह ।।

कह 'वाणी' कविराज, हर देश का हो झंडा ।

करते सब से आस, राह तके रोज चंदा ।।

 

कविराज भानु



 धर्मवती के भानु जो, नेपाली कविराज

रामायण अनुवाद का, कीनो दुर्लभ काज ।।

कीनो दुर्लभ काज, आदि कवि सम कहलाए

सिक्किम-दार्जिलिंग, भक्त लाखों जस गाए ।।

कह 'वाणी' कविराज, धन्य है मातु भारती

हुए धनंजय धन्य, धन्य माता धर्मवती ।।

 

जीवन ढल गया...........

जो जलना था वो सब जल गया ।
जो गलना था वो सब गल गया ।।
'वाणी' दर्द, दर्द सा लगता नहीं अब ।
दर्द के सांचों में जीवन ढल गया ।।


कवि अमृत  'वाणी'

नोटा री गड्डियां

नोटा री गड्डियां
अन कलदारां री खनक में तो
ई दुनिया में हगलाई हमझे ।

पण लाखीणा मनक तो वैज वेवे
 जो रोजाना
मनक ने मनक हमझे ॥

'वाणी'
अतरी झट बदल जावे
ओळखाण मनकां की
आछा दनां  में मनक
मनक ने माछर  हमझे ।

अन मुसीबतां में
मनक
माछर नै  मनक हमझे ॥

कवि अमृत  'वाणी'

मुक्तक