मायड़ भाषा में राम स्तुति: कवि अमृत 'वाणी' रचित 'राम चालीसा' मेवाड़ के गौरव को समर्पित।

जय एकलिंग जी! जय श्री राम! 🚩

चित्तौड़गढ़ की पावन और वीर धरा पर आयोजित ऐतिहासिक 'जौहर मेले' का अवसर हमेशा से ही हमारे गौरवशाली इतिहास, मातृभूमि के प्रति प्रेम, त्याग और बलिदान का सर्वोच्च प्रतीक रहा है। इस वर्ष का यह पवित्र आयोजन मेरे जीवन में एक अत्यंत अविस्मरणीय, ऐतिहासिक और गौरवपूर्ण क्षण लेकर आया। इस विशेष और ऊर्जावान माहौल में, मुझे मेवाड़ राजघराने के आदरणीय श्री विश्वराज सिंह जी मेवाड़ से प्रत्यक्ष और आत्मीय भेंट करने का परम सौभाग्य प्राप्त हुआ।

इस ऐतिहासिक और सांस्कृतिक मिलन के दौरान, मुझे उन्हें एक बेहद अनूठी, आध्यात्मिक और विशेष कृति भेंट करने का अवसर मिला— 'राम चालीसा'। यह कोई साधारण वंदना नहीं है, बल्कि हमारी अपनी मीठी, ओजस्वी और समृद्ध मायड़ भाषा, 'राजस्थानी' में रची गई प्रभु राम की एक अद्भुत स्तुति है। इसका उत्कृष्ट सृजन श्रद्धेय कवि अमृत 'वाणी' जी द्वारा किया गया है।

प्रभु श्री राम की असीम महिमा और उनके मर्यादा पुरुषोत्तम स्वरूप को जब हमारी राजस्थानी भाषा के ठेठ और आत्मीय शब्दों में पिरोया गया है, तो उसकी दिव्यता हृदय को गहराई तक छू लेती है। कवि अमृत 'वाणी' जी ने अपनी अगाध राम-भक्ति और साहित्य के प्रति अपने समर्पण को इस राजस्थानी राम चालीसा के हर एक दोहे और चौपाई में सजीव कर दिया है।

मेवाड़ की पुण्य भूमि हमेशा से धर्म, संस्कृति, कला और स्वाभिमान की रक्षक रही है। ऐसे में, जौहर मेले के इस भावपूर्ण और ऐतिहासिक वातावरण में, मेवाड़ के गौरव श्री विश्वराज सिंह जी को राजस्थानी भाषा में रचित यह राम-भक्ति साहित्य सप्रेम भेंट करना, मेरे लिए अपनी मातृभाषा और सांस्कृतिक जड़ों के प्रति गहरा सम्मान प्रकट करने जैसा था। उन्होंने भी इस साहित्यिक और आध्यात्मिक प्रयास की अत्यंत सराहना की और इसे सहर्ष स्वीकार कर हमारा मान बढ़ाया।

यह क्षण मेरे लिए केवल एक शिष्टाचार मुलाकात नहीं था, बल्कि यह मेवाड़ की वीरता, प्रभु राम के प्रति हमारी सनातन श्रद्धा और राजस्थानी साहित्य के संरक्षण का एक बेहद सुंदर और जीवंत संगम था। हमारी संस्कृति और भाषा ऐसे ही पल्लवित और पुष्पित होती रहे, यही प्रभु से कामना है। 🙏✨