जंगल के राजा रहे , सदियों से जो शेर ।
चिड़ियाघर के पिंजरे , होते रैन-बसेर ।।
होते रैन-बसेर , ताकते नव काॅलोनी ।
फैक्ट्री धुंआ देख , हॅंसे योजना सलोनी ।।
कह 'वाणी' कविराज , कटे पेड़ मन-मन कहे ।
उजड़ रहे परिवार , न जंगल के राजा रहे ।।
जंगल के राजा रहे , सदियों से जो शेर ।
चिड़ियाघर के पिंजरे , होते रैन-बसेर ।।
होते रैन-बसेर , ताकते नव काॅलोनी ।
फैक्ट्री धुंआ देख , हॅंसे योजना सलोनी ।।
कह 'वाणी' कविराज , कटे पेड़ मन-मन कहे ।
उजड़ रहे परिवार , न जंगल के राजा रहे ।।
मुम्बई अधिवेशन में , गांधी वाक्य कराल ।।
गांधी वाक्य कराल , जय घोष ''करो या मरो' ।
कह जन-मन भूचाल , अब गोरों से मत डरो ।।
कह 'वाणी' कविराज , होगा रोज नया गज़ब ।
भागो अपने देश , अंग्रेजों छोड़ कर सब ।।
राष्ट्र-गान दो-दो रचे, हैं बारह नाॅवेल ।।
हैं बारह नॉवेल , गुनगुनाते गीतांजलि ।
मात शारदा लाल , कोटि-कोटि श्रद्धांजलि ।।
'वाणी' भारत रत्न , पुलकित सारे मित्रवर ।
कविता,नाटक, गीत , पेंटिंग रवींद्र कविवर ।।
कपड़े सब के खास है , साहब हो या मेम ।
भांत-भांत की क्वालिटी , पैसों का सब गेम ।।
पैसों का सब गेम , अच्छा सिस्टम पुराना ।
बहुत मिले आराम , सीखे चर्खा चलाना ।।
कह 'वाणी' कविराज फेंसिंग ड्रेसें लफड़े ।
लड़े कचहरी माय , पहन फेशन के कपड़े ।।
अमेरिका की द्वेषता , विश्व युद्ध के माय ।बम गिरा कर हिरोशिमा , लाखों जीव जलाय ।।
लाखों जीव जलाय , आज भी उठती लपटें ।
कीनो सभी विचार , भावी प्रलय से निपटें ।।
कह 'वाणी' कविराज ,सर्वसम्मति सहित लिखा ।
बन सकेगा ना कोय , फिर से कभी अमेरिका ।।
पिंगली वेंकैयाजी
(राष्ट्र-ध्वज निर्माता )
वेंकैयाजी पिंगली , झंडा दिया बनाय ।
नंबर इसका पांचवा , अशोक-चक्र लगाय ।।
अशोक-चक्र लगाय , केसरिया ओज प्रतीक ।
सफेद सिखाय शांति , हरा है प्रगति की लीक ।।
'वाणी' अशोक-चक्र , याद रखना भैयाजी ।
झंडे की मुस्कान , सलामत वेंकैयाजी ।।
धनपतराय श्रीवास्तव, हुए कथा-सम्राट ।
गोदान, गबन,निर्मला, कफ़न,पूस की रात ।।
कफ़न,पूस की रात, परीक्षा,बूढ़ी काकी ।
अन्तर्द्वंद्व नर-नार, रखा ना कुछ भी बाकी ।।
'वाणी' प्रेम चंद, पहचान ऐसी बनाय ।
हिंदी देश-विदेश, पहुंचाई धनपतराय ।।
मैथिलीशरण गुप्त जयंती
गुरुकुल, भारत भारती, पहले रचनाकार ।।
पहले रचनाकार, मुखरित की खड़ी बोली ।
अब हिंदी श्रंगार, सजा रही वृहद टोली ।।
कह 'वाणी' कविराज, जग व्यापकता संकेत ।
लिखते लाखों हाथ, प्रेरणा-पुंज साकेत ।।
हरे-भरे वन हैं अगर, फल पाएंगे रोज ।
तन-मन हैं जब संतुलित, रोज मनेगी मोज ।।
रोज मनेगी मोज, रहेंगे मिलजुल भाई ।
खाना खाना साथ, आय ना कभी दवाई ।।
कह 'वाणी' कविराज, गांव-शहर खुशियां भरे ।
बड़े करे परिवार, पौधे अगर हरे-भरे ।।
पद जो न्यायाधीश का , है इसलिए महान ।एक-एक की बात को , सुने लगा कर ध्यान ।।
सुने लगा कर ध्यान , वे खुद को वहां रखकर ।
सोच गहन गंभीर , करे हर राज उजागर ।।
कह 'वाणी' कविराज , तय करे अपराधी कद ।
कितना मन बेचैन , कहे सज़ा-ए-मौत पद ।।
रामचरित मानस
अंतस निर्मल राखिए, दान-पुण्य
कर पाठ ।
अच्छे-अच्छे सोच की, बांधे मन
में गांठ ।।
बांधे मन में गांठ, बढ़ाना
ज्ञान उजाला ।
ऐसा बढ़े प्रकाश, रहे ना तिल
भर काला ।।
कह 'वाणी' कविराज, सुमन
रामचरित मानस ।
लगे राम परिवार, सजाएं ऐसा अंतस ।।
चंदा मामा जानते, मेरा दूर मुकाम ।
पहुंचेंगे मुझ तक वही, कोशिश हो अविराम ।।
कोशिश हो अविराम, आया अपोलो ग्यारह ।
तब नीलआर्मस्ट्रांग, एल्ड्रीन चले चंद्र सतह ।।
कह 'वाणी' कविराज, हर देश का हो झंडा ।
करते सब से आस, राह तके रोज चंदा ।।
महारथी ऐसे बनें, खेल खिलाड़ी चेस ।
खेलो प्यारे खेल को, पिटे न प्यादा रेस ।।
पिटे न प्यादा रेस, जेल में राजा जाए ।।
हाथी,घोड़ा, ऊंट, वज़ीरी भी भरमाए ।
कह 'वाणी' कविराज, चल के चाल चतुर तने ।
पल में राजा मार, महारथी ऐसे बने ।।
संकेत कहे बात को, कैसा दिल का हाल ।
आठ प्रहर अठखेलियाँ, उठते रहे बवाल ।।
उठते रहे बवाल, कैसे जानेंगे यार ।
समय नहीं है पास, भेज इमोजी दो चार ।।
कह 'वाणी' कविराज, पल-पल सब रहो सचेत ।
अनुभव साझा होय, शीघ्र इमोजी संकेत ।।
आधा प्रतिशत नीर ही, बुझा रहा जग प्यास ।
तीन टका पानी यहाँ, पूर्ण करे सब आस ।।
पूर्ण करे सब आस, बात-बात बातें अड़ी ।
तर्क करे विद्वान, खूब उछालते पगड़ी ।।
कह 'वाणी' कविराज, हल होयगी यूँ बाधा ।
ढ़ाई प्रतिशत ध्रुव, फिर प्यास बुझाय आधा ।।
हरेला है कुमाऊँ में, श्रावण का त्यौहार ।नई फसल संकेत दे, माने हर परिवार ।।
माने हर परिवार, रख भांत-भांत के बीज ।
पिलाय मन से नीर, बीज न होए खारिज ।
कह 'वाणी' कविराज, लगे खुशियों का मेला ।
शिव-गौरी आशीष, भू हरी करे हरेला ।।
चेहरा देख-देख के, मत होना हैरान ।
करनी कितने जन्म की, सब जाने भगवान ।।
सब जाने भगवान, दिया सब सोच समझ कर ।
सूरत सुंदर होय, गुण क्या रहते वहीं पर ।।
कह 'वाणी' कविराज, चुको न मौका सुनहरा ।
प्लास्टिक सर्जरी होय, चमक उठेगा चेहरा ।।
विक्रम अपने देश का, चंद्रयान था तीन ।
ऐसी भरी उड़ान जो, अमर हुआ वह सीन ।।
अमर हुआ वह सीन, चांद पर ढूंढ़ा पानी ।
प्रज्ञान का संज्ञान, लेते रहे विज्ञानी ।।
कह 'वाणी' कविराज, बाग-बाग हुए हमदम ।
थे एस सोमनाथ, साराभाई व विक्रम ।।