कृष्ण जन्माष्टमी
कन्हैया जनमे जेल में , पढ़े सुदामा संग ।
रास रचाए गोपियां , बदल-बदल के रंग ।।
बदल-बदल के रंग , जन-मन भाव विभोर ।
मारा मामा कंस , बचा न कोई उस दौर ।।
'वाणी' गीता पाठ , कर रही घर-घर मैया ।
मटकी दी लटकाय , फोड़ जाना कन्हैया ।।
कृष्ण जन्माष्टमी
कन्हैया जनमे जेल में , पढ़े सुदामा संग ।
रास रचाए गोपियां , बदल-बदल के रंग ।।
बदल-बदल के रंग , जन-मन भाव विभोर ।
मारा मामा कंस , बचा न कोई उस दौर ।।
'वाणी' गीता पाठ , कर रही घर-घर मैया ।
मटकी दी लटकाय , फोड़ जाना कन्हैया ।।
उपनिवेश
जनपद उपनिवेश बना , लिए जग में अनेक ।
गए कई फिर हाथ से , आज़ाद एक-एक ।।
आज़ाद एक-एक , उत्तर-दक्षिण कोरिया ।
तब कांगो , बहरीन , शब्द- बाण फिर गोलियां ।।
'वाणी 'यूं आज़ाद , अब कितने ऐसे देश ।
रहे अब तक गुलाम , कहे जनपद उपनिवेश ।।
स्वाधीनता दिवस रहा , लाल किले से बोल l
झंडा लहराता रहे , गगन गूंजते ढ़ोल ।।
गगन गूंजते ढ़ोल , जब सैनिक हैं तैनात ।
अमन-चैन संदेश , हैं सदियों की सौगात ।।
कह 'वाणी' कविराज , सुरक्षा में नवीनता ,
कोशिश सब की एक , रहे अमर स्वाधीनता ।।
जंगल के राजा रहे , सदियों से जो शेर ।
चिड़ियाघर के पिंजरे , होते रैन-बसेर ।।
होते रैन-बसेर , ताकते नव काॅलोनी ।
फैक्ट्री धुंआ देख , हॅंसे योजना सलोनी ।।
कह 'वाणी' कविराज , कटे पेड़ मन-मन कहे ।
उजड़ रहे परिवार , न जंगल के राजा रहे ।।
हाथी वन अति सघन में , चले बना कर झुंड ।
उछले पानी सूंड से , जहाँ मिले जल-कुंड ।।
जहाँ मिले जल-कुंड , मौज मस्ताने मनाते ।
बोत्सवना वन माय , गिने सर्वाधिक जाते ।।
कह 'वाणी' कविराज , युगों के हैं ये साथी ।
क्यों तुम घटते जाय , बताओ सफेद हाथी ।।
ज़वानी गज़ब आग है , रुक-रुक कर सुलगाय ।
मनवा उड़ता ठान के , दसों दिशा में जाय ।।
दसों दिशा में जाय , रहें जो धुन के पक्के ।
ला कर मोती खोज , देख कर हक्के-बक्के ।।
कह 'वाणी' कविराज , रचे कुछ अमर कहानी ।
पढ़ें हज़ारों बार, हैं वही धन्य जवानी ।।
व्यंग्यलेखक हरिशंकर , हुए जमानी गांव ।
होशंगाबाद जनपद , मुसीबतों की छांव ।।
मुसीबतों की छांव , सदाचार का ताबीज ।
कहानी,उपन्यास , हास्य-व्यंग्य टाकीज ।।
कह 'वाणी' कविराज , हज़ारों पढ़ते अपलक ।
हँस-हँस आंसू आय , थे ऐसे व्यंग्यलेखक ।।
राष्ट्र-गान दो-दो रचे, हैं बारह नाॅवेल ।।
हैं बारह नॉवेल , गुनगुनाते गीतांजलि ।
मात शारदा लाल , कोटि-कोटि श्रद्धांजलि ।।
'वाणी' भारत रत्न , पुलकित सारे मित्रवर ।
कविता,नाटक, गीत , पेंटिंग रवींद्र कविवर ।।
कपड़े सब के खास है , साहब हो या मेम ।
भांत-भांत की क्वालिटी , पैसों का सब गेम ।।
पैसों का सब गेम , अच्छा सिस्टम पुराना ।
बहुत मिले आराम , सीखे चर्खा चलाना ।।
कह 'वाणी' कविराज फेंसिंग ड्रेसें लफड़े ।
लड़े कचहरी माय , पहन फेशन के कपड़े ।।
अमेरिका की द्वेषता , विश्व युद्ध के माय ।बम गिरा कर हिरोशिमा , लाखों जीव जलाय ।।
लाखों जीव जलाय , आज भी उठती लपटें ।
कीनो सभी विचार , भावी प्रलय से निपटें ।।
कह 'वाणी' कविराज ,सर्वसम्मति सहित लिखा ।
बन सकेगा ना कोय , फिर से कभी अमेरिका ।।
राणा उदय सिंह जयंती
उदयसागर झील बणा , उदयपुर द्यो बसाय ।।
उदयपुर द्यो बसाय , लाय भारमल हमचार ।
अकबर संधि प्रस्ताव , राणा कीनो इंकार ।।
'वाणी' सब सामंत , गूंज उठी यूं जय-जय ।
लड़ा आखरी सांस , आज़ादी प्यारी उदय ।।
ज्ञान चतुर्वेदी (व्यंग्यकार
ज्ञान चतुर्वेदी हुए , यशस्वी व्यंग्यकार ।
चिकित्सक हृदय-रोग के , पद्म श्री पुरस्कार ।।
पद्म श्री पुरस्कार , कहानियां व उपन्यास ।
'बारामासी' खास , उपहास से रचे हास ।।
कह 'वाणी' कविराज , भांत-भांत के सम्मान ।।
मिला विरासत माय , दादा-नाना से ज्ञान ।।
इक धन से पिछड़ा अगर, एक करोड़ों पास ।।
एक करोड़ों पास , न देना और न लेना ।
सब सिक्कों के खेल , झंझटों की है सेना ।।
कह 'वाणी' कविराज , सुख-दुःख अपने सहने ।
रखें सभी से प्रेम , सुने समझदार बहनें ।।
पिंगली वेंकैयाजी
(राष्ट्र-ध्वज निर्माता )
वेंकैयाजी पिंगली , झंडा दिया बनाय ।
नंबर इसका पांचवा , अशोक-चक्र लगाय ।।
अशोक-चक्र लगाय , केसरिया ओज प्रतीक ।
सफेद सिखाय शांति , हरा है प्रगति की लीक ।।
'वाणी' अशोक-चक्र , याद रखना भैयाजी ।
झंडे की मुस्कान , सलामत वेंकैयाजी ।।
मैथिलीशरण गुप्त जयंती
गुरुकुल, भारत भारती, पहले रचनाकार ।।
पहले रचनाकार, मुखरित की खड़ी बोली ।
अब हिंदी श्रंगार, सजा रही वृहद टोली ।।
कह 'वाणी' कविराज, जग व्यापकता संकेत ।
लिखते लाखों हाथ, प्रेरणा-पुंज साकेत ।।
विश्व स्तनपान दिवस
प्यारे-प्यारे लाल का, पल-पल रखना ध्यान ।हो जाए छः माह का, नियमित मां स्तनपान ।।
नियमित मां स्तनपान, जब लगे सब कुछ खाने ।
दे पौष्टिक आहार, बैठना दूध पिलाने ।।
कह 'वाणी' कविराज, हो जाय वारे-न्यारे ।
लड़ने सरहद जाय, रक्षा करेंगे प्यारे ।।
धनपतराय श्रीवास्तव, हुए कथा-सम्राट ।
गोदान, गबन,निर्मला, कफ़न,पूस की रात ।।
कफ़न,पूस की रात, परीक्षा,बूढ़ी काकी ।
अन्तर्द्वंद्व नर-नार, रखा ना कुछ भी बाकी ।।
'वाणी' प्रेम चंद, पहचान ऐसी बनाय ।
हिंदी देश-विदेश, पहुंचाई धनपतराय ।।