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ag mein jeevan neer hai / जग में जीवन नीर है - Paryavaran Ke Dohe @ Kavi Amrit 'Wani' (PD112)


जग में जीवन नीर है, सुन जग जीवनराम।
राम-राम तुम फिर करो, पहले नल का काम।।

शब्दार्थ :- नीर = पानी

भावार्थ:- पृथ्वी पर 3/4 भाग पानी होना ही इस बात का प्रमाण है कि जल ही इस संसार का प्रमुख आधार है । आवश्यकतानुसार सुनियोजित ढंग से ही पानी का उपयोग किया जाना चाहिए । हे जगजीवनराम, तुम इन बातों को बड़े ही ध्यान से सुनते हुए जीवन में उतारलो । ’वाणी’ कविराज कहते हैं कि भक्तिभाव मे राम राम का स्वमरण भी तुम थोड़ी देर बाद कर लेना यदि उस वक्त नल में पानी आ गया और पानी व्यर्थ बह रहा है तो पहले उस नल को बन्द करें भरे जल पात्र भीतर लाकर खाली करके रखते हुए तुम कुन्त भक्ति करने बैठ जाओं । राम-राम करते हुए पुण्य लाभ के प्रभाव से नल भी अवष्य ज्यादा आऐगें ।




Rojgaar sabko mile / रोजगार सबको मिले - Paryavaran Ke Dohe @ Kavi Amrit 'Wani' (PD111)

जनसंख्या जब कम रहे, अच्छे होय विकास।
रोजगार सबको मिले, सुन्दर हो आवास ।।

शब्दार्थ :- रोजगार =जीविकोपार्जन हेतु आय के स्त्रोत, निवास = रहने हेतु मकान

भावार्थ:- देश  के चहुमुंखी विकास में जनसंख्या का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है। यदि आबादी कम होगी या बहुत ही कम गति से बढ़ेगी तो सभी को पर्याप्त सुख-सुविधाएं उपलब्ध हो सकेगी । आशा के अनुरूप देश का विकास होना संभव होगा । सभी को अपनी-अपनी योग्यता, क्षमता व अनुभवानुसार रोजगार भी उपलब्ध हो सकेेंगे । देश में सर्वत्र खुशहाली रहेगी। ’वाणी’ कविराज यह कहना चाहते हैं कि जनसंख्या विस्फोट भारत वर्ष की ज्वलंत समस्या हैं। इस पर शीध्र ही विचार-विमर्ष करते हुए स्वनिय निर्णय की प्रवृत्ति विकसित करना अतिआवश्यक  है।




Kar Sabaka Sammaan / कर सबका सम्मान - Paryavaran Ke Dohe @ Kavi Amrit 'Wani' (PD110)

पार नही है ज्ञान का, कभी न कर अभिमान।
नया-नया रोज़ पढ़ना, कर सबका सम्मान।।

शब्दार्थ :- बढ़ते रहो = बौद्धिक विकास करना,

भावार्थ:- संसार में कई प्रकार के विषय है । ज्ञान-वृक्ष की क्रोटि कोटि ष्षाखाएं है एक-एक डाली पर अनन्त पत्ते है ऐसी अन्नत जालियां है सामान्य व्यक्ति जीवनी में उस वट वृक्ष की एक शाखा का भी किंचित ज्ञान ही प्राप्त कर सकता है । इसलिए किसी भी विद्वान को अपने ज्ञान व अनुभव पर अभिमान कदापि नहीं करना चाहिए । ’वाणी’ कविराज कहते है। कि स्वाध्याय द्वारा प्रतिदिन अध्ययन करते रहना चाहिए । ज्ञान के साथ-साथ यदि विनम्रता भी जीवन में आ जाती है । तो वह व्यक्तित्व अवश्य ही चिरस्मरणीय बन जाता है। विद्धान व अनुभवी व्यक्तियों को चाहिए कि वे अपने ज्ञान को सुपात्रों में अनवरण बांटते रहें ।






Janavaron Ko Palate / जानवरों को पालते - Paryavaran Ke Dohe @ Kavi Amrit 'Wani' (PD109)


जानवरों को पालते, सुनो बाल गोपाल।
प्रशिक्षण में सब सीखलो, लो संग ग्वाल-बाल।।

शब्दार्थ :- गोपाल = गायों को पालने वाले, ग्वाल-बाल = पशु  पालकों की दिन भर साथ रहने वाली मित्र-मण्डली

भावार्थ:- ’वाणी’ कविराज कहते है कि हे पषुपालकों हे गोपालों । तुम सब हमारी एक बात सदैव ही याद रखों कि यदि आप पशुपालन से संबंधित कोई प्रशिक्षण प्राप्त कर लेते हैं तो यह आपके व्यावहारिक एंव सैद्धान्तिक ज्ञान को अवष्य बढाएगा । जानवरों के सामान्य आहार, रोग, निदान संबंधी पर्याप्त जानकारियां आपको प्रशिसण द्वारा हासिल हो जाएगी। इससें आप काफी सुविधा अनुभव करंगे । अपने साथियों को भी अपपने ज्ञान से लाभन्वित कर सकेगें। कई दृष्टिकोणों से उपयोगी यह प्रशिक्षण सभी पशु पालकों को प्राप्त करने का अवसर मिलना अपेक्षित है।






Jangal Me Mangal Rahe /जंगल में मंगल रहे - Paryavaran Ke Dohe @ Kavi Amrit 'Wani' (PD108)

मानवीय शिक्षा मिले, सारे करें प्रयास।
जंगल भी मंगल बने, ऐसा होय विकास।।

शब्दार्थ :- जंगल में मंगल = अतिसाधारण परिस्थितियों में भी अच्छा जीवन बिताना ।

भावार्थ:- ’वाणी’ कविराज कहना चाहते हैं कि सभी व्यक्तियों को मानवीय षिक्षा एवं जीवन के अनुभवों को आत्मसात करने के पर्याप्त अवसर मिलते रहने चाहिए। कम से कम वह इतना सीख ले कि यह मनुष्य जीवन क्या है ? इस जीवन में कौन से कार्य अधिक करने चाहिए और कौन से कार्य नहीं करने चाहिए । इतना प्रयास हर प्रशासन व हर नागरिक को करना चाहिए। ऐसे ज्ञानार्जन के पष्चात् ही हम ईष्वार प्रस्त साधारण सी सुख सुविधाओं में भी श्रेष्ठ जीवन व्यतीत कर सकेंगें। सभी के विकास की मंगल भावनाओं को लेकर कदम से कदम मिलाकर चलने का हाथ, से हाथ मिला कर साथ चलने के फायदां को आम आदमी समझ सकेगें, ऐसी व्यवस्थाऐं सर्वत्र उपलब्ध कराई जानी अपेक्षित हैं।






Dhara Chabbis Lagti /धारा छब्बीस लगती - Paryavaran Ke Dohe @ Kavi Amrit 'Wani' (PD107)

धारा छब्बीस लगती, सजा नब्बे दिन पाय।
जुर्माना है पांच सौ, सुधर-सुधर सब आय।।

शब्दार्थ :- जुर्माना = आर्थिक दण्ड

भावार्थ:- पशुओं  पर क्रूरता संबंधित अधिनियम के अन्तर्गत ही धारा 26 के अनुसार कोई निर्दयी व्यक्ति धारा 22 के अन्तर्गत यदि पषुओं द्वारा प्रदर्शन  (खेल) करता है उसके करतेव्यों से लोगों का मनोरंजन करता है तो इसे भी अपराध की श्रेणी में मानते हुए 500 रू. तक आर्थिक दण्ड या तीन माह की जेल की सजा दिए जाने का प्रावधान हैं। ’वाणी’ कविराज कहते हैं कि अपराध की गंभीरता को देखते हुए उसे दोनों ही प्रकार के दण्ड दिए जा सकते हैं। जब ऐसे निर्दयी व्यक्ति जेल की सजा भुगतेंगे तो अवष्य ही उनकी बेरहमी में अर्थात् उनकी निर्दयता में काफी कमी आएगी ।





Pashu Krrurta Na Hoi /पशु क्रुरता न होय - Paryavaran Ke Dohe @ Kavi Amrit 'Wani' (PD106)


नियम साठ में यूँ कहा, पशु  क्रुरता न होय।
धारा ग्यारह देखले, जेल-जेल तू रोय।।

शब्दार्थ :- पशु क्रुरता = पशुओं के प्रति निर्दयता पूर्वक व्यवहार करना

भावार्थ:- सन् 1960 में पशु  कू्ररता निरोधक अधिनियम पारित किया गया। उसका उद्देष्य यह था कि पषूओं को दी जाने वाली अनावश्यक पीड़ा को रोका जा सके। दूसरे अधिनियम की धारा 11 के अन्तर्गत दर्शाया गया है कि यदि कोई व्यक्ति पशुओं पर अत्याचार करना है तो इसे अपराध की श्रेणी में मानते हुए उस पर अर्थिक या उसे जेल या दोनो ही प्रकार की सजाएं मिल सकती हैं ।






Daya Kar Bejuban Par / दया कर बेजुबान पे - Paryavaran Ke Dohe @ Kavi Amrit 'Wani' (PD105)


दया कर बेजुबान पे, सब कहें दयावान।
तुम पर भी करने दया, दोडेंगे भगवान।।

शब्दार्थ :- बेजुबान = वे प्राणी जी अपनी जिव्हा से बोल नही सकते, दयावान = जिनके हदय में दूसरो के प्रति बहुत दया हो।

भावार्थ:- ’वाणी’ कविराज कहते हैं कि हम अक्सर अपने भाई बहिन, परिजन ग्रामवासी इत्यादि जिन-जिन पर भी दया करते है, उन दयाओं के साथ प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से हमारा छोटा-बड़ा स्वार्थ जुड़ा होता है। उस स्वार्थ पूर्ति की आषा से बनावटी दया की जाती है। वास्तव में यह दया नहीं, दया की मजाक है। सच्ची दया तो वही है कि हम प्राणी मात्र पर दया करें, चाहे वह मनुष्य,पशुपक्षी, वनस्पति ही क्यों ना हो। सभी पर दया करने वाले को ही सच्चा दयावान कहा जाता है । यदि अन्र्तमन से प्राणीमात्र को आप अपना समझने लग गए तो उसका परिवार बहुत विशाल हो जाएगा। आप पर भी दया करने दयानिधि दौड़ते हुए स्वयं आपके द्वार पर आ पहुॅचेंगे ।




BuchadKhane Band Ho / बूचड़खाने बन्द हों - Paryavaran Ke Dohe @ Kavi Amrit 'Wani' (PD104)


बूचड़खाने बन्द हों, जन-मन करे पुकार।
सबको इस संसार में, जीने का अधिकार ।।

शब्दार्थ :- बूचड़खाने = जहां मांसाहार हेतु पषुओं को काटा जाता हैं, जन = व्यक्ति पुकार = अन्तर्मन की आवाज

भावार्थ:- ’वाणी’ कविराज कहते हैं कि जहां-जहां भी बूचड़खाने है वहां मांसाहार प्राप्ति हेतु लाखों निर्दोश मूक पशूओं को काटा जाता है तुरंत उन्हें बन्द किए जाने चाहिए । यही जन-जन की पुकार है । परमात्मा के बनाए गए इस विचित्र संसार में सभी प्राणियों को जीने का पूर्ण अधिकार है। उनकी निर्धारित आयु सीमा से पूर्ण उन्हें क्यों मारा जायं । यही उनके प्रति सच्चा न्याय होगा।







Pashu Ke Bhi Jiv Hai / पशु के भी जीव है - Paryavaran Ke Dohe @ Kavi Amrit 'Wani' (PD103)


रोज रखें यह ध्यान सब, है पशु के भी जीव ।
अधिक वनज जब दिया रख, निकल जायगा जीव।

शब्दार्थ :- जीव = जीवात्मा, वजन = भार,

भावार्थ:- इतना सा ध्यान तो हम सबको रखना चाहिए कि हमें हमाराा जीव जितना प्रिय है ठीक वैसे ही पषुओं को भी उनका जीव उतना ही प्रिय होता है । ’वाणी’ कविराज कहते हैं कि भार वहन करते समय इस बात का पूर्ण ध्यान रखें कि उन पशुओं पर उनकी क्षमता के अनुरूप ही भार डालना चाहिए। यदि लम्बे समय तक लोभवंश इसके प्रति लापरवाही बरती गई तो आपको पशुधन के संबंध में विभिन्न प्रकार की हानियां उठानी पड सकती हैं।





Begunah Pashu Kat te / बेगुनाह पशु काटते - Paryavaran Ke Dohe @ Kavi Amrit 'Wani' (PD102)

बेगुनाह पशु काटते, बोले ना कुछ बोल।
आखरी फरियाद यही, खोल सके तो खोल।

शब्दार्थ :- बेगुनाह = निर्दोश, फरियाद = प्रार्थना, खोल = जीवनदान देना ।

भावार्थ:- मांसाहार के दृष्टिकोण से हजारो पीढ़ीयों से पशुओं की जीव हत्याएं होती आई हैं। यदि एक न्यायाधीश के दृष्टिकोण से देखा जाए तो यही तथ्य सामने आता है कि इन जानवरों का दोष यही है कि ये निर्दोश हैं । इतना ही नहीं पशु इतने बेबस और लाचार हैं कि वे अपनी बात अपने दुःख को कह भी नहीं केवल आंसू बहाते हैं ।
’वाणी’ कविराज कहते है कि इतना सब कुछ होने के बावजुद भी वे सब एक निवेदन तो अवश्य करते ही हैं कि हे षेरों की संतानों वीर बहादुरों सुनो यदि मिें खेल सकते हो तो खेल कर हमें जीवनदान देओं ।





यदि चल-हाॅस्पीटल चलें, करने पशु उपचार ।
रोग-मुक्त पशुधन रहे, करलो जल्दी विचार।।

शब्दार्थ :- चल हाॅस्पीटल = वह हाॅस्पीटल जो रोगियों के पास चल कर जावे

भावार्थ:- ’वाणी’ कविराज कहते है कि ऐसे चल हाॅस्पीटल भी होने चाहिए जो गांव-गांव,शहर-शहर में जाकर रोगियों का उपचार करें ।........ जिस प्रकार मनुष्य अपने बारे में सोचता रहता है कि उसको किसी प्रकार का रोग नहीं सौ वषो तक वह सानन्द जीए निरोग रहने के लिए वह न केवल सोचता बल्कि सतत् प्रयत्नशील भी रहता है।
अनवरत चलने वाले इस स्वचिन्तन से बाहर निकल क रवह पशुओं के लिए भी कुछ सोचे कि किस प्रकार उनके उपचार की व्यवस्थाओं में आसानी से सुधार लाया जा सकता है। इन तथ्यों पर भी विद्वजनों पर्याप्त विचार-विमर्श होना परमावश्यक  है।

T.V. Moter Car / टी.वी. मोटर कार - Paryavaran Ke Dohe @ Kavi Amrit 'Wani' (PD100)


आवाज बहुत बढ़  रही, टी.वी. मोटर कार ।
कर जोड़ निवेदन करो, आप हैं समझदार।।

शब्दार्थ :- करजोड़ = हाथ जोड़ कर/ नम्र निवेदन

भावार्थ:- यदि आपके पास-पड़ोस में ही कई सज्जन बहुत ही तेज आवाज में रेड़ियो-टी.वी. माईक बजाते हैं । कारे, मोटर, कुछ भी तेजी से आवाज कराते हुए वाहन चलाते हैं तब भी आपको एकाएक उनसे वाकृ युद्ध प्रारंभ नहीं कर देना चाहिए । पहले आप उन्हें मीठी में समझाइए कि भाई साहब आपको क्या कहें आप तो इस नगर के प्रतिष्ठित व्यक्ति है। आप तो सर्वाधिक समझदार है, हमें ऐसा कहने की जरूरत ही नहीं पड़नी चाहिए थी। खैर कोई बात नहीं जी भूल हो गई होगी । कृपया टी.वी. की इस कर्ण मेडी विस्फोटक ध्वनि को कम करने का कष्ट करें । इस प्रकार निवेदन करने पर 99 प्रतिशत पड़ौसी तो मान जाया करते है। और यदि इसके बावजूद भी नहीं मानते हैं तो फिर आपको अपने इस सामूहिक पर्यावणीय, संकट निवारण के लिए कानून की सहायता लेनी चाहिए किन्तु यथा संभव ऐसे सार्वजनिक कार्य मे व्यक्तिगत  विवाद आधार नहीं हो ऐसा प्रयास करें।




Agar Vaha Podhe Lage / अगर वहां पौधे लगे - Paryavaran Ke Dohe @ Kavi Amrit 'Wani' (PD99)



ध्वनि प्रदूषण कर रहा, जब सबको कमजोर।
अगर वहां पौधे लगे, सोंख लेय सब षोर।।

शब्दार्थ :- सोखेेंगे = पौधों द्वारा ध्वनि तरंगो को अपने में समाहित कर लेना,

भावार्थ:- ’वाणी’ कविराज कहते है कि यदि आपके चारों और बहुत ही अधिक शोर-शराबा होता रहता है और आप विवष हैं, तब ऐसा करना चाहिए कि अपने भवन के आस-पास कई प्रकार के फलदार पौधें लगा कर ध्वनि-प्रदूषण को कम कर सकते हैं । पौधें घरों में होने वाले शोर-शराबे को सोख लेते है। पौधों से फल-फूल-पत्तियां आदि लाभों के अतिरिक्त ध्वनि-प्रदूषण नियंत्रण एक विचित्र अदृष्य सेवा हैं। ऐसी अदभुद सेवाओं के लिए हम पेड़-पौधों के आदिकाल से ही सदैव ऋणी रहें हैं।










Aavaaj Aay Jor Ki / आवाज आय जोर की - Paryavaran Ke Dohe @ Kavi Amrit 'Wani' (PD98)

VV


आवाज आय जोर की, उच्चे भवन गिराय।
थर-थर बंगले कांपते, दरारें बढ़ती जाय।।

शब्दार्थ :- दरार = भवन की दीवारों में तरेड़ (क्रेक) आ जाना

भावार्थ:- ध्वनि के भीतर सर्व विनाशक शक्ति भी छीपी हुई है । वर्षाकाल में जब आकाश में तीव्रतम मेघ-गर्जन होता है। आकाश में कई मिलों तक बिजली चमकती हुई दिखाई देती है ऐसे समय में जहां-जहां बिजली गिरती वहां भारी जन-धन की हानि की संभावनाएं रहती हैं कमजोर भवनों में लंबी-लंबी दरारें पड़ जाती है। कभी-कभी कई जानवर व व्यक्ति भी एक साथ मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं। हम उन मेघ-गर्जन की ध्वनि को तो रोक नहीं सकते किन्तु यह अवश्य कर सकते हैं कि नए बनने वाले मकानों में चूना, सीमेन्ट, इत्यादि सामग्री अच्छी क्वालिटी की जगावे । जो-जो भवन स्वतः गिरने की स्थिति में हैं वहां निवास नहीं करें । बड़ी-बड़ी इमारतों में तांबे की छड़ लगाकर अर्थिग करने से भवन की सुरक्षा बढ़ती है।




Layud Speaker Kam Kro / लाउड स्पीकर कम करो - Paryavaran Ke Dohe @ Kavi Amrit 'Wani' (PD97)


टेंशन आय दिमाक में, घटता है अनुराग।
लाउड स्पीकर कम करो, सुनना मीठी राग।।

शब्दार्थ :- टेंशन = मानसिक तनाव, बेराग = वैराग्य/सांसार से विरक्ति, मीठी राग = धीमी गति से कोई गीत सुनना

भावार्थ:- ’वाणी’ कविराज कहते है कि लम्बे समय तक तेज ध्वनि सुनने से न केवल कान खराब होते बल्कि स्वभाव में चिड़चिड़ापन आना, अनिद्रा, स्मृतिदोश उत्पन्न होना दैनिक कार्यो के प्रति अरूचि और कच्चा बैराग्य उत्पन्न होना आदि, कई प्रकार के दोश प्रकट होते हैं। इस प्रकार की परिस्थितियों से बचने के लिए प्रारंभ से ही सावधानी रखनी चाहिए। लाउड स्पीकरों की ध्वनि कम रखें । वे गीत-गजल आपको कितने ही प्रिय हों लेकिन धीमी आवाज में सुनना सभी के लिए हितकर है।





Bahre Lakho Kaan / बहरे लाखों कान - Paryavaran Ke Dohe @ Kavi Amrit 'Wani' (PD96)




फिफ्टी- फिफ्टी हो गए, बहरे लाखों कान ।
अब धीरे बोले नहीं, गई निराली शान।।

शब्दार्थ :- फिफ्टी- फिफ्टी = लगभग आधे-आधे, जाय निराली षान = कानों के सुनने की स्वभाविक प्रवृति

भावार्थ:- महानगरों की स्थिति ध्वनि-प्रदूषण के कारण सर्वाधिक चिन्ताजनक बन चुकी हैं। हजारों व्यक्ति ऐसे मिल जाएंगे जो लगभग आधे बहरे हो चुके हैं । ’वाणी’ कविराज कहना चाहते हैं कि अब भी स्थिति पूर्णतः अनियंत्रित नहीं हुई है। यदि सभी प्रयास करें तो इसमें काफी हद तक सफलता प्राप्त की जा सकती है। यदि इस और कुछ भी ध्यान नहीं दिया गया तो एक दिन स्थिति ऐसी आ जावेगी कि तीव्र ध्वनि प्रदूषित क्षैत्रो में अधिकांष लोग बहरे हो जाएंगें जिससे उनकी संतानो के मित्रों,परिजनों व संग संबंधियों कमी के लिए नई परेशानियां उत्पन्न करेगी ।







Mike Jab Vivah Ke / माईक जब विवाह के - Paryavaran Ke Dohe @ Kavi Amrit 'Wani' (PD95)



माईक जब विवाह के, फाड़े प्यारे कान।
हाथ लगा कह राम को, कान बचा भगवान।।

शब्दार्थ :- माईक = ध्वनि विस्तारक यंत्र,

भावार्थ:- विवाहोत्सव परिसर में माइक द्वारा गूंजने वाली ध्वनि बिजली की ध्वनि, जेट विमानों के उड़ान के वक्त आने वाली ध्वनि, रेल्वे स्टेशन पर रेलगाड़ियों आदि से उत्पन्न होने वाली कर्णभेदी ध्वनि ये ध्वनियां 100 डेसिबल से भी अधिक होती हैं। ये सभी धमियां समान श्रेणी में  आती हैं । जब-जब हम अपने कानों पर दोनों हाथ रख कर यह प्रार्थना करते हैं कि हें प्रभु ! अब तो बस आप ही हमारे कानों की रक्षा कर सकते हैं। ऐसी तीव्रतम ध्वनियां स्वास्थ्य के लिए सर्वाधिक हानिकारक होती हैं। हमें उनसे बचने का सदैव अच्छा प्रयास करना चाहिए।




0:02 / 3:58 Shor Sharaba Yu Bada / शोर शराबा यूँ बढा - Paryavaran Ke Dohe @ Kavi Amrit 'Wani' (PD94)



शोर-शराबा यूँ  बढा, पी-पी मोटर आय।
अस्सी डेसिबल पहुँचे, सिर फटने लग जाय ।।

शब्दार्थ :-  शोर शराबा  = अप्रिय ध्वनि,

भावार्थ:- जब ध्वनि की तीव्रता 61 से 99 डेसिबल तक पहुंच जाती है तब वह आवाज हमें अप्रिय सी लगने लगती है। ट्रक मोटर, ऑटो रिक्षा, मोटर साईकिल आदि के तेज हाॅर्न से उत्पन्न होने वाली ध्वनि निष्चित ही स्वास्थ पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है। ’वाणी’ कविराज कहते हैं कि इस ध्वनि से सिर दुखना तनाव (टेंशन) उत्पन्न होना, भय, घबराहट आदि अनुभव होते हैं। ऐसी स्थिति में पांच-सात व्यक्तियों का समूह बनाकर उन यंत्रों के संचालकों से पहले नम्र निवेदन करना चाहिए ।





साठ डेसिबल तक लगे, प्यारी सी आवाज।
रिमझिम पानी बरसता, बजते जैसे साज।।

शब्दार्थ :- डेसिबल = ध्वनि का मात्रक, साज = वाद्य यंत्र

भावार्थ:- ध्वनि की तीव्रता को मोटे तौर पर तीन भागों में विभाजित किया गया है। सर्वप्रथम सामान्य स्तर की ध्वनि की हम चर्चा करते हैं। जो ध्वनि 60 डेसिबल तक होती है। वह कर्णप्रिया होती है। इसके अन्तर्गत रिमझिम-रिमझिम पानी बरसना, दीवार घड़ी की टन-टन की ध्वनि सुनाई देना, दो-चार मित्रों द्वारा पास बैठ कर आपस में मधुर वार्तालाप करना ऐसी कई ध्वनियां इसके अन्तर्गत आती हैं । इस ध्वनि की तुलना कविराज संगीत के वाद्य यंत्रों से करते हैं ।