शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2010

मछली

यह सभी जानते
जिन्दगी
पानी का बुलबुला हैं
लेकिन
कितने यह जानते हैं
क्यों
हर बुलबुले की
हर आंख में
हर वक्त
आंसू ही आंसू हैं

जो-जो भी
यह राज जान गए
फिर वे
संसार में
इस तरहां जीए
जैसे जीती हैं
मछलियां ठण्डे पानी में
उनकी पीढ़ियों में
आज तक
किसी को
जुकाम नहीं हुआ

हे प्रभु!
इस बुलबुले को भी
ऐसी मछली बनादो
जो बह सके
दरिया के प्रवाह में
जो बहा सके
दरिया को
अपने प्रवाह में
मुझे भी
ऐसी
सुनहली मछली बनादो ।


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