मंगलवार, 23 फ़रवरी 2010

बेल्ट


क्यों झूंठ बोलते हो
प्रजातंत्र के बेल्ट
कि
तुम बांधते हो पेंट को
और सम्हालते पेट को

बोलो
कब बांध सके
कब संभाल सके
नेताओं के पेट को

जब-जब
बांधने का प्रयास किया
सागर की
लहरों की तरहां
नेताओं का पेट
बढ़ता ही गया
और तुम
ढ़लते सूरज की तरहां
घटते ही गए

सुप्रीम कोर्ट के
वकील की तरहां
बेल्ट बोला
सुनिये श्रीमान्
आजकल के नेता
पेंट नहीं
पहनते हैं धोती

इसलिए श्रीमान
बांधने के प्रयास में
अक्सर उलझ जाती धोती


पांच साल तक
खूब तबीयत से
दोनों ओर से
ऐसी खींचातान चलती
कि
पांचवे वर्ष में तो
ऐसी तार-तार हो जाती
धोती
जिसे पहनना ही
नामुमकीन हो जाता

मगर उसी साल
प्रजातंत्र के सौ करोड़ धागों से
वैसी की वैसी
फिर बुन लेते हैं धोती
और
वही खींचातान
फिर शुरू होती
पांचवे वर्ष
फिर नई बुन जाती धोती

बस
यही प्रजातंत्र रूपी बेल्ट की
दौहरी पीड़ा

जिसे बिना चिल्लाए
जिसे बिना उफ् किए
सब कुछ
सहते रहना

कई वर्षों से
ऐसा ही
सब कुछ
संभवतः इसीलिए हो रहा है
किसी ने
बचपन में ही
इस मां को
ऐसे संस्कार दे दिए
पुत्र कुपुत्र जायते
माता कुमाता न भवति

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