रविवार, 14 फ़रवरी 2010

नाई की दूकान

दूकान पर जाकर बोले
सुनलो नाई पुत्र नरेश ।
आज
जल्दि डाढ़ी बनादो
गाड़ी पकड़नी है एक्सप्रेस ।।

इसे उठादे
हजामत की कुर्सी पर
मुझे बिठादे ।
इनके पैसे भी
मुझसे लेलेना
मुझे जल्दि से जल्दि निपटादे ।।

शर्माजी की शादी है
हमें बारात की बस में बैठना ।
मनुहारें तो खास नहीं की
मगर
हमें भी तो दिल्ली देखना ।।

दिल्ली देखने की
खुली है
पहली बार किस्मत हमारी ।
खा जाएगी दिल्ली
बनकर बिल्ली
यदि मैं चूक गया गाड़ी ।।



अन्तर्मन की प्रार्थना पर
वो कुर्सी से तो हट गया ।
मगर
नाई ने उस्तरा ऐसा चलाया
मेरा नाक कट गया ।।

नाई निकला नंबरी
बोला हाथ जोड़
किसी से कुछ मत केना ।
आधी कटी है
नाक आपकी
चवन्नी कम दे देना ।।

लो
कटी नाक
आपकी
अटेची में सुरक्षित रख लेना ।
दिल्ली के हॅास्पिटल में
जुड़ जाए
तो चवन्नी आते ही दे देना ।।

दिल्ली में भी
नहीं जुड़ पाए नाक
तो भी
जीवन होगा
खुशियों का खजाना ।
आपतो जानते हैं
आजकल जहाँ देखो वहां
नकटों का ही जमाना ।।

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