Pani Pilaye Ped Ko / पानी पिलाय पेड़ को - Paryavaran Ke Dohe @ Kavi Amrit 'Wani' (PD05)



पानी पिलाय पेड़ को, लेओ आशिर्वाद ।
पेड़ हमारे देवता, खूब करो फरियाद ।

शब्दार्थ :- रोज = प्रतिदिन, फरियाद = निवेदन/प्रार्थना

भावार्थ:- वनस्पति भी हमारी तरह सजीव हैं । प्रमुख अन्तर यही है कि ये हमारी तरह चल-फिर नहीं सकते एवं बोल भी नहीं सकते । यदि हम इन्हें नियमित पानी पिलाते हैं तो निश्चित ही पौधे उनके अन्तर्मन से हमे शुभाशीष देतें ।
’वाणी’ कविराज कहते हैं कि हमारी भारतीय संस्कृति ने कई वृक्षों को देवहस की श्रेणी में रखें हैं ये हमें जलाने की लकड़ी ही नहीं अनेक असाध्य रोगों की अचूक औषधियां भी देते हैं । कई असंभव कार्यो को शीध्रतिशीध्र पूर्ण करने में यें बड़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं । हमे  इनसे भी हमारे सुख-दुःख के लिए प्रार्थना करते रहना चाहिए ।



Sarswati Vandna (सरस्वती वंदना) - Paryavaran Par Dohe @ Kavi Amrit 'Wani' (PD02)



अरज शारदा से करूं, रखियो प्यारी लाज।
ऐसी यह रचना रचूं, सिद्ध होय सब काज।।

शब्दार्थ :- अरज  = प्रार्थना, रखियो = रखना, लाज = प्रतिष्ठा सिद्ध होय = कार्य पूर्ण होना, काज = कार्य

भावार्थ:- ’वाणी’ कविराज माता सरस्वती से करबद्ध प्रार्थना कर रहे हैं कि हे हंस वाहिनी । आप मेरी लेखनी पर इतनी सी अनुकम्पा करें कि हमारी प्रतिष्ठा बनी रहे । मैंने जो यह लेखन-कार्य प्रारंभ किया, लेखन अतिशीघ पूर्ण होवे एवं जिन उद्धेश्यों  को ध्यान रखते हुए इस कर्म का षुभारम्भ किया उन लक्ष्यों में हमें पूर्ण सफलता प्राप्त हो । यह कृति षीध्र ही जन-जन की लोकप्रिय हो जाए आपकी ऐसी ही कृपा-दृष्टि मेरी लेखनी पर हो ।
 

Ganesh Vandna (गणेश वंदना ) - Paryavaran Par Dohe @ Kavi Amrit 'Wani' (PD01)




पूजलूँ लंबोदर को, गाऊ गीत गणेश ।
दोहे सब ऐसे रचो, झुमे देश-विदेश ।

शब्दार्थ :- नमन करे  = पूजा = अर्चना करना

भावार्थ:- ’वाणी’ कविराज सबसे पहले लम्बोदर महाराज, विन्धविनासक गणपति जी के गीत गीते हुए प्रार्थना कर रहे हैं कि हे प्रभु ! आप हमारी लेखनी को लोकप्रियता प्रदान करें। मुझ पर गणपति महाराज की ऐसी अदर्ष्य अनुकम्पा होवे  कि इस पुस्तक का लेखन कार्य शीध्र ही पूर्ण हो जाए और यह देश-विदेश में सर्वत्र अपनी आभा विखरेती हुई पर्यावरण प्रेमियों को मार्ग-दर्शन प्रदान करें ।






कहानी : सोना और मोना / Story Sona Or Mona


घूँघट प्रथा पर कहानी : सोना मोना

प्रेरणा स्त्रोत : श्री चेतन जी देवडा कलेक्टर, चित्तौड़गढ़ लेखक : कवि अमृत वाणी अमृत लाल चंगेरिया (कुमावत) कावड़ निर्माता: श्री द्वारका प्रसाद सुथार बस्सी , चित्तौड़गढ़ जागो समय की धारा मोड़ो, घूँघट छोडो घूँघट छोडो साथ समय के तुम भी छोडो, घूँघट छोडो घूँघट छोडो

रक्त दान


समय समय पर करो  रक्त दान ।
हर जुबां कहेगी कितना महान ॥ 

कवि अमृत ‘वाणी’
अमृतलाल चंगेरिया (कुमावत)