रविवार, 1 दिसंबर 2013

बिन्दी और नौ

एक महान गणितज्ञ
मर्म-मर्म के मर्मज्ञ
विषय के ऐसे विशेषज्ञ
हर वक्त
गणित के सवालों में खोए हुए रहते थे
जगे हुए भी मानो
सोए हुए लगते थे।
भ्रकुटी फूल साइज में तनी हुई
ललाट पर सल पर सल दिखाई देते थे,
मजाक है नाक पर मक्खी बैठ जाए
घण्टो के सवाल, मिनटों में हल कर लेते थे,
और उत्तर मिलने के बाद भी
कई घण्टों तक फिर माथा पच्ची करते
सबसे लम्बा तरीका बच्चों को बताते
ताकि उनके मनमें डर
डरता हुआ जमकर बैठ जाए।
गुरुजी का यश कीर्ति और विवेक
15 दिनों में पूर्णिमा चाँद को भी पार हो गए,
साठ-साठ लड़कों की कक्षा के अन्दर
तीस-तीस लड़के टी.सी. करवा कर भाग गए

बचे हुए सारे बीमार हो गए
तीस में से उनतीस पर ऐसी मुसीबत छाती है
गणित तो छोड़ो
अब चित्रकला भी समझ में नहीं आती
किंतु अगले ही दिन
खुद की शादी के लिए
गुरुजी
एक महिने की छुट्टी पर गए
आज तक पढ़ाए गए में से
प्रत्येक सवाल को चार-चार बार
यही बरतन से करने की कह गए।
धूम धड़ाके से विवाह हुआ
लपसी लड्डू और हलवा
एक साथ परोसा था
कई स्वजन नाराज होकर भूखै उठ गए
मगर शिष्यों को तो बहुत भाया था।
पौने पाँच घण्टों के बाद
जीती हई सेना की तरह
बारात लौटी
दूल्हा खर्चों के हिसाब में व्यस्त
मजे में थे केवल दो
घोड़ा और बाराती।
बारात जब घर पर आई
खुशी
खुशी पर आतंक अनन्त की मात्रा में छाई
शत-प्रतिशत सज-धज
सजी संवरी सजनी सखी संग
साजन के शयन कक्ष में आई
सोलह शृंगार में सजी सयानी सजनी देख
सजना की बुद्धि भी
तुरंत तेवर बदल कर
गणित की फोर्म में आई।।
कड़क कर बोले, हे प्राण-प्रिया
बताओ जरा

ललाट पर बिन्दी क्यों लगाई
पत्नी बोली हे नाथ
शर्म से कैसे कहूँ
ये छोटी सी बात भी
आपकी समझ में क्यों हनीं आई।
बिन्दी मेरी मदर के सुपर विजन में
मेरी सहेलियों ने लगाई
बिन्दी से चेहरे की सुन्दरता
लगभग दस गुनी बढ़ जाती है
रूठे हुए साजन को मनाने के लिए
मने हुए को रूठाने के लिए
बिन्दी लगाई और हटाई जाती है
अर्थात

जब-जब बिन्दाणी हो
तो बिन्दी लगाई जाती है
बिन्दणी बिन्द गई हो
तो बिन्दी हटाई जाती है
बिन्दी

हर सुहागिन के लिए सब कुछ यही है
नोरमल दिनों में दस गुनी
बड़ी तीज और त्यौहारों पर
सौ गुणी शोभा बढ़ाती
शृंगार इसकी तुलना में कुछ भी नहीं है।
© कवि अमृत 'वाणी'