शनिवार, 30 नवंबर 2013

यही हमारी दीवाली


दीवाली आ गई
भारी अफसोस
कई महंगी रस्मे निभानी होगी
गमगीन मासूम चेहरों पर
भारी नकली मुस्कानें लानी होगी

ढ़हने को व्याकुल खण्डहरों पर
डिस्टेम्पर करना होगा
काले तन तन मन को फिर
सतरंगी वस्त्रों से ढकना होगा
जल कर राख हो गए कभी के
बुझे दिल से फिर
दिप जलाने होंगे
हमने खाए हजारों  गम आज गम उन्हीं गेरो को
गेवर खिलाने होंगे।

निकल गया मैं भी घर से लेकर
बडा सा झोला
आज दिवाली भरदो मिठाईयाँ
दुकानदार से यूँ बोला
सड़क पर पत्थर डालने वाला
एक अभागा मजदूर हूँ
ठेके पर गया ठेकेदार और मैं
मजदुरी से मजबुर हुँ।
थामते हुए मिठाईयों का झोला
दुकानदार से मैं यु बोला
पैसे आज नहीं है, मिलते ही पैसे
चुका दुंगा।

छीनली थैली
बिखर गई खुशियों
उन रईस कदमों में
भर गई आँखें, दिल फिर टुट गया
लाचारी की लाठी से
देख बाजार की हँसी
मैं क्रोधित होकर बोला विष्णु से
चिल्ला-चिल्ला कर कह रहा हूँ
कह देना
तुम्हारी लक्ष्मी से
लक्ष्मी पूजन से पहले हम जैसों के हाथों में भी
आनी चाहिए लक्ष्मी
वरना
उनतीस फरवरी की तरह
दीवाली
चार साल में आनी चाहिए।
तत्कालीन निकट संकटों से झूंझ रही
घरवाली
जला नहीं चूल्हा
बिलख रहे बच्चे
बिलख रही खाली
कटोरियाँ और थाली
मैं बोला हो सके तो
बिखेर दो होठों पर
खुशियों की लाली
बस यही गरीबों की दीवाली
यही
हमारी दीवाली।

कवि अमृत 'वाणी'