गुरुवार, 17 जून 2010

बुद्धि मुझे दो शारदा


बुद्धि मुझे दो शारदा, सदन शीघ्र बन जाय ।
कर पूरण स्वर-साधना, देऊ तुझे बिठाय ।।

देऊ तुझे बिठाय, विराजो मेरे घर में ।
ऐसे गीत लिखाय , हो प्रकाश अंतस में ।।

कह `वाणी` कविराज, चित्त में शुध्दी मुझे दो |
रचूं कुंडली शतक , मात सदबुद्धि मुझे दो ||

शब्दार्थ : सद्बुद्धि = श्रेष्ठ बुद्धि, सदन=भवन , नूतन = नया, अंतस में प्रकाश=आत्मज्ञान

शिल्प कला पर सो कुंडलिया
से ली गई कुंडली
कवि अमृत 'वाणी'

4 टिप्‍पणियां:

रंजना ने कहा…

Sundar prarthna...

amritwani.com ने कहा…

shukriya ranjna ji

माधव ने कहा…

मेरा सादर प्रणाम

Divya ने कहा…

देऊ तुझे बिठाय, विराजो मेरे घर में ।
ऐसे गीत लिखाय , हो प्रकाश अंतस में ..

Bahut Sundar prarthana,