बुधवार, 24 मार्च 2010

ram chalisa लेखकीय


संसार का दाता प्रत्येक जीवात्मा को उसके प्रारब्धानुसार कुछ ना कुछ ऐसा अवश्य देता है जो अन्य की तुलना में निसंदेह कुछ हद तक अतिविशिश्ट होता है। न जाने यह मेरे किस जन्म की भक्ति का प्रारब्ध है कि मां वीणा-पाणि ने अपने छलकते हुुए काव्य-कलश की एक नन्ही सी बून्द बचपन में ही मुझ अकिंचन चरणानुरागी की झोली में भी डालदी ।
सन् 1978 से ही लेखनी यदा-कदा नव काव्य सृजनार्थ हठीले बालक की भांति एकाएक इस तरह मचलती रही कि हर हाल में हंस की भांति चलती रही और हंसवाहिनी की विषेशानुकम्पा निष्चित गन्तव्य तक पहुंचाती रही ।
धार्मिक-कृतियों की अनवरत श्रृंखला में इस ‘रामचालीसा’ को प्रादेशिक भाशा ’राजस्थानी’ की प्रथम काव्य कृति का सौभाग्य प्राप्त हुआ । मर्यादा पुरूशोत्तम श्रीराम के समग्र व्यक्तित्व को संसार का कोई भी कवि पूर्णाभिव्यक्ति नहीं दे सकता, किन्तु यह सक्र्रिय कवि-मन कुछ सृजन किए बगैर मानता भी कहां।
अवतारी युग पुरूश श्रीराम के सम्पूर्ण जीवन को हिन्दी के महाकवि गोस्वामी तुलसीदासजी ने अपनी विश्व विख्यात अमर कृति ‘रामचरित मानस’ में अति लोकप्रिय शैली दोहा-चौपाई छंद में अभिव्यक्ति दी । ‘राम चालीसा’ के सृजन के पूर्व ही यह विचार आ गया था कि राम के व्यक्तित्व के अधिकाधिक महत्वपूर्ण प्रसंगों को क्रमशः जोड़ते हुए एक ऐसी मनोहर काव्य श्रृंखला सृजित की जाए जो प्रातः स्मरणीय देव वन्दनाओं के संग उच्चासन पर शोभायमान हो कर कोटि-कोटि जन मानस का कल कण्ठ-हार बन सके ।
 क्लिश्ट साहित्य को समाज का केवल प्रबुद्ध वर्ग ही हृदयंगम करता आया ,किन्तु मुझे पूरा विश्वास है कि‘ राजस्थानी ’भाशा में सृजित यह ‘राम चालीसा’ सामान्य  भक्तों को निष्चय ही संक्षिप्त रामचरित मानस के रूप में अत्यन्त प्रिय लगेगी ।
  इस काव्य सृजन के लिए मुझे मणासा-रामपुरा रोड़ पर स्थित गांव हाड़ी पीपल्या वाले माताजी , पैतृक गांव छोटीसादड़ी के धर्मराजजी बावजी , भूपालसागर की सरस्वती माता , आखर गणेश , गोलाईवाले हनुमानजी हमारे वंश चंगेरिया ष्कुमावतष् के सती , पूर्वज और झुझारजी एएवं ज्ञात-अज्ञात सभी देव-शक्तियों का भरपूर आशीर्वाद मिला ।
  आभारी हूं पिता रतनलाल चंगेरिया माता सोहनदेवी जिन्होंने मुझे पाल-पोश कर बड़ा किया  इतना पढ़ाया-लिखाया कि मैं सृजन-धर्मिता के मार्ग पर भी अग्रसर हो सका । गुरूदेव श्री श्री रविशंकरजी,लालचंदजी पाटीदार,माताजी ,श्रीजगद्वदासजी , श्रीबालकदासजी गुरूभाई श्रीलक्ष्मीलाल मेनारिया ’उस्ताद ’और महावीर सक्सेना -व्ेादराजजी साहब---का आशीर्वाद और प्रेम मिला ।
  अंकलजी श्री कन्हैयालालजी भाई श्रीनंदकिशोर, श्रीसुंदरलाल, श्रीलक्ष्मीलाल, बहिन निर्मला, ललिता,पत्नी कंचन, पुत्र चंद्रशेखर , चेतन पुत्रियां यशोदा नीलम बाल-गोपाल प्रेरणा , पायल , परी , यमन , वंशराज , युवराज आदि सभी के मुस्कुराते हुए चेहरे मुझे सृजन-मार्ग पर चलते रहेने की अनवरत प्रेरणाएं देते रहेे ।
आभारी हूं गोविन्दराम शर्मा-एम0ए0 अंग्रेजी, हिन्दी, संस्कृत, चन्द्रप्रकाश द्विवेदी , श्रीसोहनलाल चौेधरी खूबचंद‘मस्ताना‘और अग्रज भा्रता के0एल0 सालवी जो विभिन्न भाशाओं एवं संगीत की विशद जानकारियां और अनुभव रखते हैं । साथियों के  संगीत शास्त्रीय मन मस्तिश्क द्वारा पूर्ण परिश्कृत यह काव्य कृति आज आपके कर-कमलों को सुवासित कर रही है । बोधगम्य प्रक्रिया में , अधिकाधिक रोचकता एवं सुगमता लाने के लिए कठिन शब्दार्थ एवं प्रसंगानुकूल चित्रों के साथ-साथ प्रत्येक चार-चार पंक्तियों के भावार्थ भी दिए हैं ।
प्रिय भक्त जनों आपके भक्तिमय अन्तर्मन के महासागर में उद्वेलित विचार तरंगों को सुनने के लिए चिर प्रतीक्षारत आपका अभिन्न अनुज।

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कवि अमृत 'वाणी'
सम्पर्क सूत्र :- +919413180558
अमृत लाल चंगेरिया (कुमावत) चित्तोडगढ

2 टिप्‍पणियां:

Jandunia ने कहा…

आपकी ये रचना पढ़ी। अच्छी लगी। रामनवमी की ढेर सारी शुभकामनाएं।

Udan Tashtari ने कहा…

आभार इस प्रस्तुति का.