मंगलवार, 30 मार्च 2010

मायड़ भाषा


मायड़ भाषा लाड़ली, जन-जन कण्ठा हार ।
लाखां-लाखां मोल हे, गाओ मंगलाचार ।।

वो दन बेगो आवसी ,देय मानता राज ।
पल-पल गास्यां गीतड़ा,दूणा होसी काज ।।


अमृत 'वाणी'

3 टिप्‍पणियां:

Amitraghat ने कहा…

बहुत बढिया...."

राकेश कौशिक ने कहा…

पहली दो पंक्तियाँ तो आसानी से समझ आ गयीं - तीसरी चौथी दो बार पढ़ा तब समझ सका - अपनी सभी भाषाएँ बहुत प्यारी लगती हैं - उतरो और तैरते रहो - आभार.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

राजस्थानी में लिखे दोंनो दोहे बहुत सुन्दर हैं!