रविवार, 14 मार्च 2010

धोळा में धूळो

धोळा,कुदरती हाथां उं दियो थको वो सर्टिफिकेट हे जिने ईं दुनियां को कोई भी मनक राजी मन उं कदै लेबो न छावे ,पण जीमणा में खास ब्याईजी-ब्याणजी की खास मनवार के न्यान सबने न-न करर्ता इंने हंसतो-हंसतो लेणाईज पड़े।
भारतीय समाज की कतरी पीढ़ियां निकळगी होचबा को तरीको हाल तक स्कूल ड्र्ेस के न्यान सबको एक जसोई हे । जसान
कोई मनक के धोळा आबो चालू व्या ईंको मोटो मेतलब यो हे के अबे वो दन-दन हमझदारवे तो जार्यो । धोळो माथो मनका के ज्ञानी कम ओर अनुभवी ज्यादा वेबा को संकेत देतो
रेवे ।
धोळा माथा पे नवी धोळी पाग वेवे या धोळो साफो वेवे ये अणी बात को साफ संकेत देवे कि यांका घर में जो उमर में बड़ा और बड़ा ज्ञानी जो भी हा वे थोड़ाक दन पेलयांई’ज ठेठ उूपरे जाता र्या अन् अबे वीं घर मंे हमझदार की पूंचड़ी का यै’ज र्या ।
नरी जगा में देक्यो के धोळा माथा ने देक-देक घणा मनक राजी वेवे ,अन वे धोळाबा खूद में का में छीजता रेवे । चटोकड़्या छोरा-छोरी तो अणी वास्ते राजी वेवे के नामेक दन केड़े ये बासा के तो स्वर्ग में जाय अन के नरक में जाय ये कटेे भी जाय पण आगो बळो आपाने तो जिमान जाय । नराई नवरा ईं बाते राजी वेवे के अबे थोड़ाक दन में जीमणो वेवा मै’ज हे , अन बासा ईं बास्ते छीजे के पैसा तो हगराई बडं़गे लाग ग्या अबे जीमणो कुंकर वेई । ईं चिंताई चिंताई में कतराई डोकरा हन्नीपात में आजावे । आजकाल असान का मामला नामिक कम पड़्या कां के सरकार कर्यावर बंद करा काड़्या ।

यू ंतो धूलो नराई रंग को वेवे पण सबको असर एक हरिको को’ईज वेवे । जाणे कसा भी रंग को धूळो कसी भी आंख में पड़ जावे तो आंख्या पगईं राती छट वे जावे अन दुधारु ढांडा के न्यान मनक गांवा-गांवा अदभण्या डाक्टर साहब नै हमारता फरे ।
धूळा को सभाव दो त्र्या को वे -कदीक तो यो खूद’ई नवा-नवा पामणा के न्यान बनाई हमच्यार दीदे रूपाळी-रूपाळी आंख्या में जा पड़े, कदीक यो नवी-नवी कळा लगावे । मनकां की कोटेम ने पेल्यां तो आंख्या टमकार’ने ईषारो करदे पचे कोटेम वींकी टेम देकने सब हूत हावेल मलान आंख्या मींच दोड़ता थका के असी तरकीब उं लंग्या नाके के वो चष्मा हमेत धूळा भेळो वेजावे । धूळोतो कदकोई वींकी वाट नाळर्यो । अगर वो नेम धूळा भेळो न व्यो तो या वात ते हे वो मनक सेल्फ स्टार्ट इंजन के न्यान थोड़ीक देर केड़ेई पाचो उठ’न चालबा लाग जई । देकबा वाळा हॅंसता जई’न केता जई । रो मत , रो मत देक-देक वा कीड़ी मरगी , देक या कीड़ी मरगी । यूं के-के उं बिचारा ने ठोकर परवाणे ढंग-ढांग उं रोबा भी न देवे । कदी-कदी असो वे जावे वो धूळा में पड़्यो-पड़्यो भंगार फटफट्या का साईलेंसर के न्यान बा’रा मेले , राग-राग में गीत गावे । मदारी का खेल के न्यान चारू मेर मनक भेळा वेजावे । थोड़ो वो झाटके, थोड़ो वाने झाटके ,कोई मरहम पटृी करे , कोई दवा-दारू लावे , कोई राड़ लगवावे कोई प्लास्टर छड़वावे कोई प्लास्टर कटवावे कोई कपड़ा बदले , कोई नंबर बदलवान नवो चष्मो लावे । असान दो-चार जणा घरका अन दो-चार जणा बा’ला मल’न पाचो वीने चालबा जोगो कर काड़े ।
धूूळा की एक घणी खोटी आदत देकी जिंदगी में कोई भी एक दान जो धूळा भेळो वेग्यो पचे आकी उमर वो वींका कपड़ा बड़िया उं बड़िया हाबू डिटर्जेण्ट लगा-लगा न धोतो रेवे पली अंतर की षीषियां में झंकोळ-झंकोळ अन पेरे तो धूळा को रंग पूरो कदी न उतरे कोने । अणी वास्ते हमझदारी ईंमै’ज हे कि अतरा ध्यान उं चालनो छावे कि न तो धूळो आपणी आंख्या में पड़े न आपा धूळा में पड़ा धूळो वटे को वटे’ज अन आपां आपणे ठाणे पूगा ।
धूळो आंख्या में पड़े या कोई खूद धूळा में जा पड़े यां दोयां बचे ज्यादा खराब हालत वीं दान वे जावे जद धोळा में धूळो पड़ जावे । मनक केता रेवे आछा धोळा में धूळो पटक्यो । कोई केवे आछो जनम्यो रे पूत बाप-दादा को नाम धूळा में मलायो ।
अतरी लांबी-चोड़ी वातां में सार की वात या अतरीक हे कि आंख में धूळो पड़जावे तो पाणी की कटोरी मं आंख्या खोलबाउं ठीक वेजावे , कोई खूदई’ज धूळा में पड़ जावे तो कपड़ा झाटक्या अन पाचा चालता वणो । पण धोळा में धूळो पड़ जावे नी तो वो आदमी नेम मर्या बराबर वे जावे । माजणा वाळा ने तो नवो जमारोई’ज लेणो पड़े । अणी वास्ते जीवो जतरे ध्यान राकजो आंख्या में धूळो पड़जा कै वात नी , आपा धूळा में जा पड़ा कै वात नी , माथा पे धोळा आजावे कै वात नी पण ईं वात को सबने पूरो ध्यान राकणो के कदी धोळा में धूळो नी पड़ जावे ।

रचनाकार - अमृत ‘वाणी’ चित्तौड़गढ़ राज0

3 टिप्‍पणियां:

ललित शर्मा ने कहा…

चोखी बात्।
राम राम

निर्मला कपिला ने कहा…

समझ नही पाई। धन्यवाद्

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

मेवाड़ी शैली की राजस्थानी पढ़ कर आनंद आया। कोई दस बरस पहले मैं कोटा से भीलवाड़ा मुकदमों में पैरवी करने जाता था। तो अक्सर बस में यात्रियों से यह जुबान सुनने को मिलती थी। वैसे हमारी हाड़ौती शैली और इस में मामूली अंतर है। विशेष रुप से इस बोली में स को ह बोला जाता है और हाड़ौती का छ छे, ह है में बदल गया है।