बुधवार, 10 मार्च 2010

धोती-जब्बा पगड़ी

धोती-जब्बा-पगड़ी
माथे पर तिलक और चोटी
गले में माला
राम-नाम का दुषाला
गायों को चराने के लिए
लूटेरों को डराने के लिए
हाथ में लठ

यह सब कुछ देख
विगत कुछ वर्शों से
षहरों के कई लोग
मुझे इस तरहां देखते
जैसे
मैं उनकी टी टेबल पर पड़ा हूँ
कल का उपेक्षित अखबार

वे हॅसते हुए देख रहे हैं
आज के अखबार को
जो
सर्कस के जोकर की तरहां सत्य है ।

आम आदमी का कार्टून
जो छपा है
कुछ इस तरहां
जो अपने ही घर में लूट गऐ

लूटेरे ने पहनी है
कोट और पतलून
क्या कलर मेचिंग मिलाया
काला सिर
काली टोपी
काली रात
दिखा रहा
एक-एक को पिस्तौल
अपनी जिन्दगी चाहते हो
तो तुरंत देदो

कुछ दे रहे
बिना गिने
वे
पुराने असली सिक्के
जो तुलसी विवाह,कन्यादान
मंदिर का उद्घाटन
कोर्ट-कचहरी
ईलाज और लाईलाज बीमारी
मृत्यु-भोज और ब्रह्म-भोज
किसी में भी
अब तक नहीं निकले

और कुछ
हाथ जोड़ कर निकाल रहे
इतने शुद्ध आंसू
जो उनकी
मां की मौत पर भी
नहीं निकले ।

3 टिप्‍पणियां:

निर्मला कपिला ने कहा…

िनसान के दोहरे चेहरे का अच्छा विवरण दिया है। बहुत सुन्दर रचना। बधाई अपके ब्लाग के उपर जो पँक्तियाँ हैं वो बहुत अच्छा लगी{ अगर वो महज साँस लेने को ही जिन्दगी समझते हैं तो जाओ कह दो कि मैं जिन्दा हूँ} बहुत खूब। धन्यवाद्

बेनामी ने कहा…

NIRMALA JI AAP KO BAHGUT BAHUT DHANYWAD AAP IS BLOG PAR AATE RAHE ISI Aasha me

shekhar kumawat

पाती नेह भरी ने कहा…

bahut khoob kumawat ji!

aam insaan ki jijiwisha ko aapne bahut ache dhang se ukera hai apni kavita main!

sadhuwaad