शुक्रवार, 5 मार्च 2010

शिक्षा


केवल मुद्रा-बल से
विभिन्न प्रकार की
मुद्राएं बना-बना कर
पीछले कई वर्शों से
कहीं दिन को
कहीं रात को
कहीं सुबह को
कहीं शाम को
भांत-भांत के
हजारों विद्यालयों में
लाखों अधूरे
कर रहें
करोड़ों को पूरे
कर रहे
करोड़ो पूरे ।

इसीलिए
अब तक
ना तो उन्हें बना सके पूरे
ना
स्वयं ही बन सके पूरे ।

इसीलिए
मतलब के चैराहों पर
जब-जब भी टकराते हैं
वे
आमने-सामने
दोनों ओर से छलकता है
भरपूर अधूरापन ।

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