शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2010

दूध की गंगा बहायें



मनुश्य
मशीने बनाता-बनाता
आज खूद मशीन बन गया
जिसे
मशीने भी नहीं समझ पा रही है कि
उसमें कहां-कहां विकृतियां

मेरा दावा है
दुनिया की कोई भी मशीन
एक दिन सब कुछ कर लेगी
मगर
अधूरे इंसान का पूरा ईलाज
कभी नहीं कर पाएगी

क्योंकि इसके तो
नस-नस में इतना विष घुल चुका है कि
आजकल इसका रोम-रोम
अपने ही दिल से
बगावत कर रहा है ।

रोग मुक्ति के लिए
आतुर कुछ पाश्चिम के पुजारी
केवल बटन पर बटन दबा रहे हैं
और देख रहें हैं
मशीनों की रिजल्ट स्क्रीनों को

कुछ
ऊँची ऊँची
अजानें दे रहें हैं मस्जिदों में
कुछ
घंटियों पर घंटिया बजा रहे हैं
मन्दिरों की


बाहर आकर
बस इतनी सी बात पर लड़ रहे हैं
यहां केवल अजान गूंजेगी
नहीं-नहीं
केवल आरतियों की ध्वनि गूंजेगी


अजान और आरतियों के बीच
बरसों से बैठा
अदृश्य
नीली छतरी वाला
जो
एक कान से सुनता था अजान
एक कान से सुनता था आरतियां
जिसकी
एक आंख टिकी थी
मिनारों पर तो एक गुम्बज पर

किंतु आज
दोनों आंखों से छलकी अश्रु-बून्दें
हो गया
गंगा का पानी लाल
हो गया हिमगिरी पर तिलक


हम
हम तो कुछ भी नहीं
किनारे वृक्ष हैं
आज नहीं तो कल तक
मर-मर कर भी जी लेंगे
किंतु क्या होगा
हरे-हरे खेतों की
इस लाल फसल का


इसलिए आओ
आज फिर से सब मिल कर
शंकर को
बाबा आदम को मनाएं
उन्हें उनकी
पतित पावनी गंगा फिर से दिखाएं
और पूछें
क्या यही है तुम्हारी गंगा

आओ
आज से तुम और हम मिल कर
हर रोज
शिवलिंग पर दूध चढ़ाएं
और कहें
तुमने पानी की गंगा बहाई
ठीक है
उस युग में
शायद
इसी की जरूरत रही होगी
किंतु हे भोले शंकर !
सभी प्रकार के भक्तों की ओर से
शिवलिंगों पर दूध की प्रतिदिन ऐसी धारा बहे
कुछ दूध आप अपनी ओर से मिलाके
वक्त की मांग के मुताबिक
कलियुग में इसी गंगा को
दूध की गंगा बनादो
घर-घर में
घी-दूध की गंगा बहादो ।

3 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत बढ़िया रचना.

vikas mehta ने कहा…

कलियुग में इसी गंगा को
दूध की गंगा बनादो
घर-घर में
घी-दूध की गंगा बहादो ।
bhut khub

amritwani.com ने कहा…

aap ko dhanwad vikash ji