मंगलवार, 16 फ़रवरी 2010

हरे वृक्ष मत काटो



किसको खबर है पल की , कब तक क्या हो जाय ।

होती कमी अब जल की, कौन कहाँ तक जी पाय ।।

कौन कहाँ तक जी पाय , चले कोठियों में कुलर

करे फ्रीज जल-पान , तपे निर्धन इधर-उधर ।।

कहवाणीकविराज ,धरती बाँट गगन बांटो

लो सभी शपथ आज ,तुम हरे वृक्ष मत काटो ।।

2 टिप्‍पणियां:

RaniVishal ने कहा…

Bahut acchi muhim hai....Aabhar!!
http://kavyamanjusha.blogspot.com/

परमजीत बाली ने कहा…

बिल्कुल सही....सामयिक रचना है। धन्यवाद।