रविवार, 28 फ़रवरी 2010

प्रेम रंग

चाय अन कप के न्यान होळी रो त्योहार अन रंग एक दूजा का असा लाड़ला साथी र्या थका के एक के बना दूजा ने एकल्लो रेबो आज तक कदी हुंवायोई कोनी ।
ज्यूं-ज्यूं होळी को तेवार लगतो-लगतो आवे ख्ूणा-खचारा में पड़्यो थको रंग, करंगेट्या के न्यान पड़्यो-पड़्योई रंग बदले । शेयर मार्केट के न्यान दो रूप्या की खरीद को रंग दस रूप्या लावे । होळी’ज जाणे वे सेठजी आठ रूप्या को असो कई मलावे ।

मने तो लागे ये सब वांकी अवेराई अन बोलबा का पैसा हे । या राज की वात हे , रंग की आत्माई जाणे के आज वो कसा रंग में हे ।



घणा रंगलाल ने तो याई खबर कोने के रंग कतरी त्र्यां को वेवे । नराई रंगलाल तो असा भी है जाने जीं दन देको वीं दनईं मल्टीकलर मै नजरे आवे । वांके वास्ते तो बाराई मीना होळी हे ।

अतरा तरह-तरह का रंगा में मने तो सबाउं बड़िया रंग तो मीठो रंग लाग्यो , जींकाउं नरी तरेकी मिठायां बणे । मिठायां ने देक-देक

भूखमर्या के मन में रे-रे अन भभड़का उठे । जटा तई वो लाडू चक्की को डाबो आकोई खाली वेन ढोल के न्यान बाजबा न लागजा वटा तक वींका जीव ने कदै शान्ति न मले । आकू दन उंदरा के न्यान फदक-फदक करतो-करतो मिठायां का डाबा पैज जा-जान बेठे । मां-बाप भई-बेन यार दोस्ता , की लातां घूम्मा थप्पड़ा गाळयां सब खा लेई पण वो मिठाई खायां बगेर नी मानेगा । यो मीठा रंग को खानदानी असर हे ।


मीठा रंग नै पाचे मेलतो थको वींकाउं लाख गुणो बड़िया एक रंग ओर हे जिने कतराई जुग वेग्या मनक वाने प्रेम-रंग केता आया । आज का जमाना में राम जाणे ईंके कजाणा कींकी नजरां लागी आजकाल घर-घर में यो कुदरती प्रेम रंग फीको पड़ ग्यो , ओर तो ओर लोग-लुगाई भी एक रंग में कोईने ।


फीको फट पड़्या थका ईं प्रेम रंग ने मनक आपणी-आपणी न्यारी-न्यारी तरकीबा उं होळी उं होळी गेरो करबा की सालाना कोशिशां करता रेवे हे ।
जसान कोई ईं रंग में चमार्यो रंग मलार्यो ,कोई नाळ्या को पाणी ,कोई आमळ्या को पाणी ,कोई बोतल को पाणी, कोई मीठी छा कोई

खाटी छा , कोई चलार्या नजरा का छर्रा ,कठै केषर गुलाब विष्की ठर्रा ,कोई भांग कोई ष्यांग कोई मलाइर्यो दई ,कोई मलाइर्यो सई ,कोई रूख मलाईर्यो कोई थूक मलाईर्यो । कुल मिलान वात अतरीक हे कि हर हमझदार ईं फीकाफट पड़्या थका प्रेम-रंग ने गेरो करबा के वास्ते यानि राजी करबा के वास्ते जींके जो मन में आर्यो वोई मलार्यो ।
मनकां को मतलबी रंग देक-देक दन-दन प्रेम रंग की आत्मा मै की मै छीजती जा’री । थोड़ाक दन पेल्यां यो प्रेमरंग
देशी लाल टमाटर हरीको हर परिवार का किचन में हॅंसतो खेलतो हांझ हवेरे मल जावतो हो पण आजकाल तो एनिमिया का मरीज के न्यान धोळो पड़तो-पड़तो देषी मुरग्या के अण्डा के न्यान बचारो चोराया-चोराया पे थेला-थेला पे आन उबो वेग्यो । फेर भी मनक हमझ नी पार्या । दो पीसा कम लागे ईं गुल्तारां में वे पोल्ट्रीफार्म काईज अण्डा खार्या । धरम की वात या कि धरम बगड़ता थकाई रंग न हुदरर्यो । धरम को राम-धरम बगड़तो जार्यो अन प्रेम रंग दन-दन फीका उं फीको पड़तो जार्यो । अगर योई हाल र्यो तो थोड़ाक बरसां मै मनकां की मोटी-मोटी आंख्या कोट का बटन के न्यान निर्मोही वे जई । आंख्या की ओळखाण बदल जई ।
बालपणा रा नान्या गुंगरू कलदारां पे नाचता-नाचताई एक दन अतरा बूडा वे जई के जिंदगाणी रे मुजरे कितरी मोहरां कमाई यो भी नी गण पावेगा । सेठजी री ,नोटां री थप्पयां गणता-गणताई एक दन आंख्या मिचा जई ।
अणी वास्ते होळी रो गुलाल हाथां में लेले’र बड़ा-बड़ा के लगा’र प्रणाम करो , छोटा-छोटा के लगा लगा’र वाने आगे बढ़बा को आशीरवाद देओ । अणजाण के भी लगा ’र वाने आपणे गले लगा’र वांने दोष्त बणाबा की सफल कोशिशां करो ।
थांकी कसी दुकती वात उं किंकेई कदी बंट भराग्यो वे अन वे वांका-वांका मूण्डा लेर कतराई बरसांउं थाकाउं छेटी-छेटी फरर्या वे आज आछो दन हे दोई हाथां में रंग ले’र उंका मूण्डाके लगाओ । हॅंसता-हॅंसता जटा तक उंको मूंडो पुराणा सही शेप में न आ जावे उठातई रंग लगाता रो । याई होळी री सांची सार्थकता हे । हो साल की जिंदगाणी में गाठी हिम्मत कर-कर ने हो रूठ्या थका यार दोष्तां ने मना लेवां तो होळी का नाम पे जिंदगी की या बहुत बड़ी सफलता होवेगा ।

शनिवार, 27 फ़रवरी 2010

आज भी जिंदा है

शहीदों की अंतिम श्वांसो पर

हर इतिहास
आज भी जिंदा है
चंद बंदों की खिदमतों पर
आसमां का खुदा
आज भी जिंदा हैं

सुर-ताल से
कलमकारों
आग और पानी
बरसाओं तो जाने
वे
दीपक और मल्हार रागें तो
आज भी जिंदा हैं ।
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शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2010

जिन्दगी


अगर वे
महज
श्वांस लेने को ही
जिन्दगी समझते हैं
तो जाओ
उन्हें कहदो
कि
बेशक
हम जी रहे हैं

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010

पनघट के प्रहरी

सुर्ख
इतना कह देतें

प्यास कितनी गहरी है
पनिहारिनों की चलें
बता देती हैं
गागर कितनी भरी है

युगो-युगो से होती आई
प्यास पर
छलकती गागर कुर्बान
मगर
फिर भी क्यों
घट-घट पर
पनघट के प्रहरी हैं ।

बुधवार, 24 फ़रवरी 2010

डबल बेड

उठ डबल बेड से
बंद कर
रेड़ियो, पंखा, टी. वी., टेप ,कुलर
और निकल
देहलीज से बाहर
लेकर दोपहर का टिफिन
करके खून का पानी
बहादे पसीना

खरीद
मेहनत के बाजारों से
उन हीरों के बदले रोटी

जल्दि लौट आना घर
मुस्कुराती हुई
संध्या के साथ

जहां उसी देहलीज पर
सुबह से खड़े प्रतीक्षारत
ममत्व, वात्सल्य, भ्रातृत्व, श्रद्धा, स्नेह
और
उन सबके बीच
चीर प्रतीक्षारत,
स्वागतातुर ,मुस्कुराता हुआ
पूर्णिमा का चांद

बांट दे
तू बांट दे
भूख के मुताबिक
सबको रोटी

आज सब्जी भी मय्यसर नहीं
तो खालो
मुस्कान औेर तसल्ली के साथ
और पीलो
नशीब की मटकी का
ठंडा पानी

क्योंकि
अभी तो पढ़ना है तुझे
चंद्रप्रकाश में
चंद्रमा के
चंद रहस्यमय सवाल

तू
आज ही


सितारों के अक्षर बना-बना कर
लिखले तमाम उत्तर
बेदाग कॉपी पर
सत्य, संक्षिप्त और सुंदर


क्योंकि
सुबह तो
फिर सूरज आजाएगा
एक साथ
खिड़की, दरवाजों
और रोशनदानों से
लेकर
कल के वास्ते
कितने ही
फिर
नए-नए सवाल

अमृत 'वाणी'

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2010

बेल्ट


क्यों झूंठ बोलते हो
प्रजातंत्र के बेल्ट
कि
तुम बांधते हो पेंट को
और सम्हालते पेट को

बोलो
कब बांध सके
कब संभाल सके
नेताओं के पेट को

जब-जब
बांधने का प्रयास किया
सागर की
लहरों की तरहां
नेताओं का पेट
बढ़ता ही गया
और तुम
ढ़लते सूरज की तरहां
घटते ही गए

सुप्रीम कोर्ट के
वकील की तरहां
बेल्ट बोला
सुनिये श्रीमान्
आजकल के नेता
पेंट नहीं
पहनते हैं धोती

इसलिए श्रीमान
बांधने के प्रयास में
अक्सर उलझ जाती धोती


पांच साल तक
खूब तबीयत से
दोनों ओर से
ऐसी खींचातान चलती
कि
पांचवे वर्ष में तो
ऐसी तार-तार हो जाती
धोती
जिसे पहनना ही
नामुमकीन हो जाता

मगर उसी साल
प्रजातंत्र के सौ करोड़ धागों से
वैसी की वैसी
फिर बुन लेते हैं धोती
और
वही खींचातान
फिर शुरू होती
पांचवे वर्ष
फिर नई बुन जाती धोती

बस
यही प्रजातंत्र रूपी बेल्ट की
दौहरी पीड़ा

जिसे बिना चिल्लाए
जिसे बिना उफ् किए
सब कुछ
सहते रहना

कई वर्षों से
ऐसा ही
सब कुछ
संभवतः इसीलिए हो रहा है
किसी ने
बचपन में ही
इस मां को
ऐसे संस्कार दे दिए
पुत्र कुपुत्र जायते
माता कुमाता न भवति

सोमवार, 22 फ़रवरी 2010

सलीका जीने का


इत्तफाक से
जीते जी
मिल जाए
किसी को
सलीका जीने का

फिर
एक लम्हा ही बहुत है
इस जहान में
उसके जीने का

रविवार, 21 फ़रवरी 2010

जिगर

जिगर में
हजारों कांटे हैं
हजारों
कांटों में जिगर है

सारे कांटे
यही कहते हैं
वाह !
तेरा भी
क्या जिगर है ।

शनिवार, 20 फ़रवरी 2010

सत्य


जन्म प्रथम
और
मृत्यु
जीवन का अंतिम सत्य है

इन्हें
हर बार
राजा-रंक फकीर को
जन-जन को
नत मस्तक होकर
स्वीकार करना ही पड़ता है ।

यह
जी भर के हंसाए
या
जी भर के रूलाए
हर बार
आंसू
खारे ही बहते हैं ।

अर्थात्
सत्य हंसाए
या रूलाए
आंखों में
उसके अहसासों की
शबनमी तश्वीर
इसीलिए
हर वक्त
एक जैसी ही दिखती है


क्योंकि
सत्य एक है
सत्य अटल है ।

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2010

मछली

यह सभी जानते
जिन्दगी
पानी का बुलबुला हैं
लेकिन
कितने यह जानते हैं
क्यों
हर बुलबुले की
हर आंख में
हर वक्त
आंसू ही आंसू हैं

जो-जो भी
यह राज जान गए
फिर वे
संसार में
इस तरहां जीए
जैसे जीती हैं
मछलियां ठण्डे पानी में
उनकी पीढ़ियों में
आज तक
किसी को
जुकाम नहीं हुआ

हे प्रभु!
इस बुलबुले को भी
ऐसी मछली बनादो
जो बह सके
दरिया के प्रवाह में
जो बहा सके
दरिया को
अपने प्रवाह में
मुझे भी
ऐसी
सुनहली मछली बनादो ।


गुरुवार, 18 फ़रवरी 2010

कविता कवि और श्रोता (कवि अमृत 'वाणी')




रचना कार कवी अमृत'वाणी (अमृत लाल चंगेरिया )
रिकॉर्ड :- 28/2/2009

बुधवार, 17 फ़रवरी 2010

महामंत्र

यह सत्य है
मनुश्य
इस वासनामय संसार में
धृतराष्ट्र की तरह
अंधे ही जन्म लेते हैं।

किन्तु
यह समस्या
दुगुणी होकर
सौगुणी तब हो जाती है
जब
पतिव्रता गांधारी भी
अपने ही हाथों से
अपनी ही आंखों पर
काली पट्टी बांध
पति के समकक्ष हो
जन्म दे देती
सौ-सौ पुत्रों को ।

दोनों में से कभी
कोई किसी को
भूल कर भी
भला-बुरा नहीं कहते
क्योंकि
दोनों ही अंधे हैं ।

आधुनिक युग की
कई गांधारियों के
कई बेटे ऐसे हैं
जो
जीवन कुरू-क्षेत्र
शुरू होने के
पहले ही शहीद हो जाते
कुछ इतने कमजोर हैं
लाख कोशिशें करो उन पर
कोई अस्त्र-शस्त्र
उठते ही नहीं
कुछ बचे हुए सबको यूं कहते हैं
जो भी हैं
सब कुछ हम ही हैं
और उनकी
तमाम प्रोग्रेस रिपोर्टों में
वे कुछ भी नहीं हैं ।

आज विज्ञान के
नटखट कन्हैया ने
कहीं
शिखंडियों के घर
दीपक जलाएं हैं
कहीं
हजारों एकड़
उसर को
सर-सब्ज बनाया है ।

साक्षरता,प्रौदाशिक्षा,
रेड़ियो,टी0वी0,टेप,अखबार
आदि के द्वारा
अनन्त प्रज्ञा-चक्षुओं से
कई गान्धारियों की
काली पट्टियाँ खोली हैं
प्रत्यक्ष बताया
देख
देख अपने वंश को
पीछड़ते,लड़ते-झगड़ते,कटते
और मच्छरों की तरहां
बेमौत मरते ।

असह्य सत्य को देखते ही
धृतराष्ट्र ने
पुनः अंधे होने की ठानी
गांधारी ने भी पुनः
अपनी काली पट्टी संभाली
तभी आधुनिक
विज्ञानावतारी नटखट कन्हैया ने
दोनों के हाथ थाम लिए
कहा , ‘‘तुम्हें रोशनी
इसलिए नहीं दी कि
जीवन-संघर्ष में
तबाही के मंजर देख कर
तुम पुनः अंधे हो जाओ
सन्तानों को
ईश्वर की देन बताते रहो और
कामांधता के सरगम गाते रहो ।

नहीं,नहीं,नहीं
उस युग में तुमने
सौ-सौ बेटों का
यानिकी सौ-सौ कांटों का
हृदय-विदारक मृत्यु-कष्ट झेला

भूल कर उसे
दौहराने लग गए
फिर वही गलतियां ।

युग बदल गया
वह द्वापर था
यह कलियुग है
वह धर्म-युद्ध था
यह अर्थ-युद्ध है
वह अठारह दिनों का नवजात शिशु
और यह
जीवन की पहली श्वांस से लेकर
आखिरी श्वांस तक
यानिकी पूरे सौ साल तक
हर रोज चलने वाला
बहुमुखी युद्ध है ।

मसलन
एक रूपये में
पिता ने
पहली कक्षा में दाखिला लिया
बच्चे के लिए
अब पहली कक्षा में
एडमिशन के लिए
हजार रूपये चाहिए
देखा युद्ध को
तलवारों की धार
कुछ ही वर्षों में
हजार गुनी तीखी हो गई ।

स्वार्थों की जंग में पल-पल
कट-कट कर गिर रहे हैं
नैतिकता के शीष
भ्रष्टाचारी रण-चण्डी का खप्पर
अब भी पूरा खाली है
रेलों के स्ट्रीम इंजनों की तरहां
दहाड़ती हुई
दिन भर दौड़ती रहती
जेबों का रक्त पीने ।

युद्ध का आंखों देखा हाल
कुछ इस प्रकार है
अर्थ महाभारत के कोटि-कोटि
महायोद्धाओं को बिल्कुल सही तरह से
बहुत बुरी तरह से एनिमिया हो गया
भीतर ही भीतर
सरकार की तरह
सुख - सूख कर
बिल्कुल सफेद पड़ गए


कहीं-कहीं
सरकारी डाक्टर
ईलाज कर रहें
और जगह-जगह
प्राईवेट लोग
हिमोग्लोबिन चेक कर रहे हैं


सरकारी डाक्टरों की परेशानी
यूं बढ़ रही है
कहीं
बीमारी नजर नहीं आती
कहीं
बीमार नजर नहीं आते
मरीज दिनों-दिन बढ़ रहें
देश में हॉस्पिटल कम पड़ रहे ।

इसलिए आज बता कर जाता हूं
हर दम्पत्ति के लिए
सौ-सौ बीमारियों की एक दवा
जैसे मलयाचल पर्वत की हवा
दोनों मुमुक्षु अर्थात्
प्राणेश्वरियाँ और प्राणनाथ
मिलाकर स्वर में स्वर
मिलाकर हाथ में हाथ
इस महा मंत्र को
सौ-सौ बार पढे़
सौ-सौ बार सूने
यह
अवश्यंभावी
मोक्षप्रदायी
महामंत्र
केवल तीन शब्दों का है
हमदो हमारे दो।

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2010

हरे वृक्ष मत काटो



किसको खबर है पल की , कब तक क्या हो जाय ।

होती कमी अब जल की, कौन कहाँ तक जी पाय ।।

कौन कहाँ तक जी पाय , चले कोठियों में कुलर

करे फ्रीज जल-पान , तपे निर्धन इधर-उधर ।।

कहवाणीकविराज ,धरती बाँट गगन बांटो

लो सभी शपथ आज ,तुम हरे वृक्ष मत काटो ।।

सोमवार, 15 फ़रवरी 2010

बारां बिन्द (कवि अमृत 'वाणी' कविता बाल विवाह पर आधारित )


रचनाकार कवि अमृत'वाणी (अमृत लाल चंगेरिया कुमावत )
रिकॉर्ड :- 28/2/2009

परसाद्यो भगत (राजस्थानी कहानी)

आकाई गाँव में दो नाम मनकां की जिबान पे छड्या थका हा। एक भगवान शंकर को नाम अन एक वांको लाड़लो परसाद्यो भगत यो गाँव बस्यो जदकाई ये दोई नाम गाँव के साथे-साथे रिया गांव वाळा को कसोई काम रूक्यो कोने दन-दन सब प्रकार का आनंद बढ़ताई ग्या
शंकर भगवान की मूरत वसान तो शान शकल उं दिखबा में कई खास रूपाळी कोनी ही वसा’नी देखोतो शंकर भगवान खूदी कसा रूपाळा हा पार्वती ने पनबा ग्या जीं दन तो वे राजा का भी राजा बींदराजा हा बड़िया उं बड़िया बण-ठण ने तर्या-तर्या रो श्रृंगार करने पचे पधारता पण भोळा-भंडारी तो ब्याव की हुणताई पेली ,जसा हा वसाई उठने चाल्ता वण्या , जाणे आकी दुनिया में यांको इज माण्डो मण्डर्यो वे आकी लागती-बलगती में यांके हरीकाईज एक-एक बराती ने कजाणा कटाउं-कटाउं छांट-छांट लाया यांकी कळा यै जाणे
थाने तो आछी त्र्याउं याद हे नी रामाबा शंकर भगवान की बारात देखबा ने गाँव का जो-जो छोरा-छोरी ग्या वांका मूं बिचारा आदा तो पाछाई आया गाँव का मनक घबरार्या वाने पांच-पचास छोरा-छोरी नजरै आर्या अन उटीने शंकर भगवान ने सरप्राईज वेर्यो वाने वांकी लिस्ट के हिसाब उं पांच-पचास बराती बत्ता कसान नजरे आर्या
असो को असोई म्हाके गाँव को परसाद्यो भगत हो ,मने तो यूं लागे के शंकर भगवान की बरात में मोतबिर बरात्या में एक यो भी हो , बींद खोतळी भी ईंज ढाबी कां के आत्मा तो अजर-अमर हे कतराई जन्मा उं यो वांके लारे को लारै
परसाद्यो भगत आका मळक को एदी हो, कदी तो हापड़बा में तो हमझ्योई न , कतरी दान मनकां इने धो काड़्यो पण वो धोया थका गाबा पेरबो नी हीक्यो एक कांगस्यो जेब में राकतो हो जींकाउं वो हूर हरीका रूंग्चा ने कदी-कदी बांच लेतो
उं नाराण्यो नई तो घणा बरसां तक दरपतो-दरपतो वींकी जामत करतो हो एक दान हजामत करताईन वीं नई ईंकाउं पैसा मांग लीदा वो तो जसो उठ्यो वसोई नई का हाराई राटी-राम्चा वाली लोड़ा की पेटी लेने भाग ग्यो भाग्यो ग्यो -भाग्यो ग्यो। हित्तर साल का बासा हतरा साल का मोट्यार ने पकड़बा दोड़्या वो कई पकड में आवे आगे जान पेटी ने खोली जीमे नरी खाली जग्या ही जिंमें वीं भाटा भर नाक्या अन पेटी ने उंडा कूड़ा में लेजा नाकी बिचारा नाराणबा उंई टेम पेले गांव ग्या अन हगरा राच-पीच नवा मोलाया तुरत-फुरत में नवा लाता तो दूजै दन मिठूबा घुड़कग्या अन नाराणजी तो मिठूबा का घरका नाई मसाणा में औजार बना बी-पच्ची जणा की लोड्या कुंकर करता माथा पे हाथ फेरबा उं थोड़ी लोड्या वेवे
वीं दन पचे कसाई नई का बेटा में अतरी ताकत कोने जो केता पेली परसाद्या भगत की जामत करे ओर गांव का कसाई नई में अतरी ताकत कोने ही जो जामत कीदा केड़े वींकाउं एक ढींग्लो मांग्ले
परसाद्या की जेबां में चोईसी घण्टा त्र्या-त्र्या को परसाद पड्योई रेतो हो जणी पे वणी को मन राजी वेजातो वणी ने झट खूल्या मंू काडन परसाद दे देतो बाकी मूंडाउं मांग्बा वाला ने तो वो मंग्ता-मंग्ता के-के वाने परसादकी जग्या कांकरा दे देतो यां चक्कर में गाँव का पांच- चार बूडा-ठाडा डोकरा का दांतड़ा जाता र्या जटा केड़े गाँव का मनक घणा होश्यार वेग्या वे शंकर भगवान को परसाद बनाई देख्या खा लेता पण ईं परसाद्या भगत के हात का परसाद ने पांच - पांच दान देख भाळ ने पचे परसाद आरोगता
बालपणा की बात हे वो भणवा जातो जीं दान कदी-कदी वींकी मां वीने आपणी ताकत उं हपड़ा देती। रोट्या तो दरप के मारे क्लाश का छोरा-छोरी मनवार कर-कर ने खुवा देता सब माड़साब वीने पाचै-पाचैै दरवाजा के भड़े बठाणता ताकि छुटृी वे ताईन भागबा में ईंको पेलो लंबर बण्यो को बण्योई रेवे कोई छोरो तो ईंके लारे दोड़तो आगे पाछे ओर तो ओर इने आतो थको देक गूंगट वाली लाड़ी दाद्या होराजी ने आता देक एक आड़ीने वे जावे वसान ईज वीने दोड़तो थको देकने बजार मंे सब एक आडी ने वे जाता धन्नाट दोड़तो थको वो असान लागतो जाणे फायर ब्रिगेड की लाल गाड़ी लाय बुझाबा जारी वे
एक दन परसाद्या के घरे पाचॅं-पन्द्रा पामणा पीर आया रोट्या-पाणी खा खुआ बेठाईज हा अन वो भी पूग्यो थोड़ी देर वी, अन वांकामू एक दाना-घड़ो बोल्यो अजी राजकुमारजी आज मां थांने देखबा के वास्ते आया यो हुणताई ने परसाद्यो भगत तो सबाका का बचमें गाबा खोल ने बेठग्यो लो देखो मने सबाने अपणा मोर बताबा लाग्यो देखो अटीने तो विज्ञान वाळी मेडम आंग्रा उगाड़ मल्या , वींका उपरे गणित वाळा माड़साब का घूम्मा अटीने नाळो अंग्रेजी वाळा की कामड़्या
वीं दन केड़े वीने कोई देखबा वाळा नी आया ओर वींका दो तीन भाई-बेना की हगाया में भी घणा रोबा पड्या परसाद्या भगत को जीव परसाद में अन शिवाजी का मंदर मेंज रमतो रेेवतो सुबे शाम शंकर भगवानकी आरती में घण्टिया बजावणो परसाद खा-खा ने पेट भर लेणो हांझ हुदी पेट में कटै जग्या खाली रेजाती तो चार-पाॅंच मक्की का रोट ढोलकी हरीका पेट में हरका लेणो बस आकाई दन में इतराक काम की वाने पूरी-पूरी हूद पड़ती ही
कुल मिलान कै भी वो परसाद्यो भगत हो तो लाखीणो भगत । 24 घण्टा वो ओम नमः शिवाय का जाप करतोई रेवतो हो चंदन बाॅंट‘-बाॅंट भगवान के लगातो पचे खुद का करम पे लगातो मन-मन में कै का कै मन्तर बोल्या करतो आकाई गाॅंववाळा को दिमाक ठण्डो रेवतो हो परसाद्यो घणो हुकनी मनक हो। कीनै जाता थका ने हामे मल जातो नी तो वींका अटक्या-बटक्या काम पगई बण जाता
गाॅंव का मनक परसाद देबा के वास्ते वाने हमारता फरता अन वो परसाद खाबा के वास्ते मनका ने हमारतो फरतो हो वीने चेतो राक ने हमारो तो पांच-दस मिनट में वो कटे कटे मल जातो बुलावे तो कसाई चंदजी के घरे नी जातो , भूका मरतो मर जातो पण मांग खाबा कींकेै घरे जातो अणी बास्ते जींको भी मन वेतो थाळी सजा ने मंदर ले जातो चार-पांच थाळ्या बाल भोग के नाम की हदैई मंदर पे भगत लोग ले आता परसाद्यो भोग लगान भावतो जो खातो अन बच जातो वाने जेबां में भर लेतो दन भर फरतो रेतो थोड़ो थोड़ो चड्या छरकल्या ,गायां ने ,टेगड़ा ने वांदरा ने खवाड़तो रेवतो
गाॅंव का टेगड़ा तकात हमेशां मंदर अई-अई होवता हा कां के वी भी जाणता हा के वाने रोट्या परसाद्यो भगत खवाड़े परसाद्यो भगत टेंशन फ्री वेन लांबा टांग्ड़ा करने हू तो रेवतो अन टेगड़ा आकी रात जागता रेता हा वना पूच्या कोई रात ने मंदर में पग मेल देतोनी टेगड़ा असा पाचे पड़ता नी वांको जांगल्यो फाड़ देता ठेठ वणाने वणाके घरां में वाड़ीन पचे आवता
गाॅंव में परसाद्या ने मनका करता कुत्ता ज्यादा हमझ ग्या हा मतलबी मनक तो अतराई हमझया हा के कोई पेशी पे जार्यो वेतो,कोई कसाई शुभ काम उं कटैै जार्यो वे तो , कोई धंधा पाणी उुं पेले गाँव जार्यो वे तो हूकन परसाद्या का लेन जाता हा छोर्या हारे-पीर जाती , कोई डिलेवरी पे जाती परसाद्या का हूकन लेन जाती मन में बोलमा करने जाती हे परसाद्या थूं शंकर भगवान ने कईजै हउ हरीको वे जई तो पाची आन थारे परसादी करूंली
शंकर भगवान की कीरपा उं कतराई परिवारां में नवा-नवा कुल-दीपक को उजाळो हुयो हाॅंचा विशवास वाला मनक मुकद्मा बाजी में जीत्या , कितराई मन धार्या कारज सिद्ध हुया वीं शिव मंदर को काम वरसां ताई चालतो - चालतो एक विषाल मंदर बण ग्यो गांवा-गांवा का लोग जोड़ा की धोग देबा के बास्ते वणी शिव मंदर आबा लाग ग्या।
एक साल शिवरात्री के दन हवेर पेली परसाद्यो भगत खूब जोर-जोर की घंटियां बजाई आरती में खूब नाच्यो ओर पचे आलकी-पालकी मार ओम् नमः शिवाय का जाप करबा के वास्ते कजाणा कसाई मोरत में बेठ्यो के दन आंथ बा तई भूखो-तरस्यो जाप करतो र्यो अटीने दन बावजी अस्त वेबा वाळा हा वटीने परसाद्या का प्राण पखेरू उड़ने कठे का कठै चल्या ग्या ।वाने मंदर उं तोक ने वांके घरे लेग्या
भजन मण्डली में गाँव वाळा आंसू बहाता थका भोला शंकर से या ही प्रार्थना करी की हे प्रभु ! हर गाँव में असा परसाद्या भगत होणा छावे ओर म्हाके गांव को यो परसाद्यो भगत तो पाछो झट उं झट म्हांका गांव में पाचो आजावे कोई भजन गाता र्या , कोई घण्टियां बजाता र्या असानी गाता-बजाता आकी रात निकळगी
दन उगताई गाँव वाळा अंतिम संस्कार कर परसाद्या ने आंसू टपकती आंख्याउं विदाई दी गांव री लुगाया पगा चालता छोरा-छोरी अन दूध पीवता टाबर्या ने लेन ठेठ मसाणा तई परीगी , छोर्या उंची-उंची ढाळा ले-ले अमरनाथ रा गीत गाया खास-खास लेणा असान की ही परसाद्या भगत अमर रहीजो जुग-जुग जीजो पाचा बेगा अईजो परसाद्या भगत की जे

रविवार, 14 फ़रवरी 2010

तार

आज कल
किसी से कोई काम करवाना हो
कई दिनों तक वह केवल आप की बात सुनता है
कई महीनो तक केवल विचार करता है
फिर
कुछ मिनटों का काम
कुछ महीनों में निपटा देता है

यही कार्य प्रणाली
कई ऑफिसरों
कर्मचरियों के घट- घट में
ईश्वर की तरह विद्यमान

मसलन
आपने किसी को मृत्यु का तार दिया
वह बाहरवे दिन तो मिल ही जाता
बाइ चान्स लेट हो गया
मृतक की
छह मासी या बारह मासी तक तो मिल ही जायेगा

कुछ समझदार दर एवम दूरदर्शी व्यक्ति तो
सीरियस होते ही आपने परिजनों को अपने आत्मीय जनों को
सभी ईष्ट मित्रो को तार दे देते हैं

इससे बहुत बड़ा फायदा यह होता हे की
तार धोनी की तरह ही कितने ही रन बनाए
फिर भी बिफोर टाइम पहुँच जाता है
अर्थात् बहुत सीरियस का तार कभी कभी मृत्यु से पहले मिल जाता है

और आत्म जन पीटी ऊषा की तरह दोडे चले आते है
और अंतिम संस्कार में सम्मलित हो जाते है
वे चन्दन की लकड़ी तो देते हे
किन्तु कर्ण केश फिर भी रह जाते
क्यूँ की तब तक नई चला गया होता
नई को फिर अर्जेंट तार दिया जाता है
देर से आने वाले सभी लेट कमर्स के
कर्ण केश लेलो भाई
यह तार तो ग्यारवे दिन ही मिल जाता
क्यूँ की
लोकल तार हैं |

नाई की दूकान

दूकान पर जाकर बोले
सुनलो नाई पुत्र नरेश ।
आज
जल्दि डाढ़ी बनादो
गाड़ी पकड़नी है एक्सप्रेस ।।

इसे उठादे
हजामत की कुर्सी पर
मुझे बिठादे ।
इनके पैसे भी
मुझसे लेलेना
मुझे जल्दि से जल्दि निपटादे ।।

शर्माजी की शादी है
हमें बारात की बस में बैठना ।
मनुहारें तो खास नहीं की
मगर
हमें भी तो दिल्ली देखना ।।

दिल्ली देखने की
खुली है
पहली बार किस्मत हमारी ।
खा जाएगी दिल्ली
बनकर बिल्ली
यदि मैं चूक गया गाड़ी ।।



अन्तर्मन की प्रार्थना पर
वो कुर्सी से तो हट गया ।
मगर
नाई ने उस्तरा ऐसा चलाया
मेरा नाक कट गया ।।

नाई निकला नंबरी
बोला हाथ जोड़
किसी से कुछ मत केना ।
आधी कटी है
नाक आपकी
चवन्नी कम दे देना ।।

लो
कटी नाक
आपकी
अटेची में सुरक्षित रख लेना ।
दिल्ली के हॅास्पिटल में
जुड़ जाए
तो चवन्नी आते ही दे देना ।।

दिल्ली में भी
नहीं जुड़ पाए नाक
तो भी
जीवन होगा
खुशियों का खजाना ।
आपतो जानते हैं
आजकल जहाँ देखो वहां
नकटों का ही जमाना ।।

शनिवार, 13 फ़रवरी 2010

करगेंट्या के न्यान

जीत गयो र जीत गयो , वोटां वाळी जीत ।
ढोल-नगाड़ा आज से , गावे थांका गीत ।।
गावे थांका गीत , खुशबू वाळी माळा ।
या तो मनखां जीत ,था मती करिजो छाळा ।।
के ’वाणी’ कविराज , जा‘गा बारा के भाव ।
करगेंट्या के न्यान ,जो बदल दिया थां भाव ।।





शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2010

मिटटी का फैंसला


लाल कोठी पर
लगी संगमरमर की फर्श
फर्श पर चांदी का सिंहासन
जिस पर बैठा
कबर में पैर लटकाए
बुड्डा कुबेर
कांपते हुए हाथों से
थामी हुई
सोने की थाली
सोने की कटोरियों में
चांदी के चम्मच
डूबे हुए मूंग की दाल के हलवे में
और पास में
काजू बादाम वाले
दूध का गिलास लेकर
खड़ी है शालियाँ

जीवन के नंदन वन में
जिनकी जिंदगी गुजरती
युधिष्ठर के रथ की तरहां
यथार्थ के धरातल से
इतने उपर
सातवे आसमान पर
कि उनसे
छोटे-बड़े इंसान तो क्या
हिमालय भी नहीं टकरा सकता

मगर, आश्चर्य ,
जो कभी धरती पर नहीं चले
जिनके जूतों पर कभी
धूल तक नहीं जम सकी
उनके पेट में पथरी जम गई


बरबाद हो गए
ईलाज में इस तरहां
जो धरती के उपर चलते थे
युधिष्ठर के रथ की तरहां
वे आजकल
बड़ी तेजी से
धरती के अंदर उतरते जा रहे हैं
सीता की तरहां


मगर
जो झोंपड़ियों में
जन्म लेकर
पीढ़ियों तक
मिट्टी से
उपजाते रहे सोना
वही खरा सोना
हर बार बिकता रहा
उन्हीं महलों की देहलीज पर
सिर्फ
सिर्फ
पुराने कर्ज के ब्याज के बदले
या चंद सिक्कों में


फिर मजबूर होकर
बेबस मजदूर की तरह
लगते रहे
वहीं हरा
सोना उपजाने में

जो हर सर्दी में पीते रहे
मिट्टी की मटकी का पानी
खाते रहे
हण्डिया की सब्जी
मिट्टी के तवे की रोटी
जिसमें मेहमान की तरहां
अक्सर मिलती रही मिटृी

कितना बड़ा आश्चर्य
जो पुरूषार्थ की पाचन-शक्ति से
पहाड़ों को पचा जातें
उनके पेट में कभी मिटृी नहीं जमती
और जिनके जूतों पर
कभी मिटृी नहीं जमीं
कैसे
उनके पेट में पथरी जम जाती

सब कुछ
मिटृी का ही फैंसला है
कि
किसकी
किस तरहां मिटृी पलीत करनी है
और कहां
किस मिटृी से
कैसा
शानदार महल बनाना है।