सोमवार, 13 जुलाई 2009

सब जानते


सब जानते
तू
भी कभी
मजबूत पहाड़ था ,
आज मिटता-मिटता हो गया
छोटा सा कंकर I
मगर
तनिक भी चिंता मत कर
केवल दो बातें ध्यान रखा कर
पहली बात
मौके
की तलाश में
तुझे रात-दिन फिरना है
दूसरी बात
तुझे
कब कहाँ और किसकी आँख में
कैसे गिरना है I



अमृत 'वाणी '
सेंती चित्तौड़गढ़

9 टिप्‍पणियां:

Pratyush Garg ने कहा…

बहुत शानदार! अभूतपूर्व तर्क... :P

स्वच्छ संदेश: हिन्दोस्तान की आवाज़ ने कहा…

चिट्टा के इस असीम संसार में आपका स्वागत है...

आप लिखते रहे और अच्छा लिखते रहें.

मेरी शुभकामनायें हैं आपके साथ.

Dr. shyam gupta ने कहा…

aspasHt sandesh, va shabdaarth.

चंदन कुमार झा ने कहा…

चिट्ठाजगत में आपका स्वागत है.......भविष्य के लिये ढेर सारी शुभकामनायें.

गुलमोहर का फूल

हेमन्त कुमार ने कहा…

अच्छी कविता से प्रारंभ । आभार ।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

BAHOOT HI SAARTHAK LIKHA HAI .... SWAGAT AI AAPKA .........

शशांक शुक्ला, +919716271706 ने कहा…

अच्छी कविता लिखी है

नारदमुनि ने कहा…

narayan narayan

योगेश स्वप्न ने कहा…

blog jagat men swagat hai, umda rachna.